गांधी-मुक्त नहीं होगी कांग्रेस

कांग्रेस के भीतरी हाहाकार की नियति यही हो सकती है। वैसे तो पराजित विपक्ष में कोहराम मचा है। राजद में तेजस्वी यादव के खिलाफ बगावत छिड़ गई है। रालोसपा के सभी विधायक पार्टी छोड़ कर जद-यू में शामिल हो गए हैं, लेकिन कांग्रेस की स्थिति सदमे वाली है। राजस्थान में मंत्रियों  ने ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की चुनावी भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं। एक कांग्रेस नेता ने तो सार्वजनिक रूप से कांग्रेस कार्यसमिति को भंग करने या सभी सदस्यों के इस्तीफे लेने का आग्रह किया है। दरअसल कांग्रेस की यह सर्वोच्च इकाई ही फर्जी है, क्योंकि सभी नेता मनोनीत हैं अथवा विशेष आमंत्रित हैं। पराजित और बूढ़े नेताओं का जमावड़ा है कांग्रेस कार्यसमिति। लिहाजा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के इस्तीफे पर कोई भी फैसला लेने का दुस्साहस कौन कर सकता है? चुनावी पराजय के बाद पंजाब के कांग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़ समेत पार्टी के 13 प्रदेश अध्यक्ष इस्तीफे सौंप चुके हैं। विडंबना वही है कि उन्हें स्वीकार करें, तो राष्ट्रीय अध्यक्ष के इस्तीफे पर अलग निर्णय कैसे किया जा सकता है? नियति यही है कि राहुल गांधी इस्तीफा देंगे, तो राहुल गांधी ही स्वीकार/ अस्वीकार कर सकते हैं। राहुल गांधी का विकल्प भी राहुल गांधी ही हैं। राहुल वाकई इस्तीफा देते हैं, तो कांग्रेस में बिखराव के हालात पैदा हो सकते हैं। यदि वह कांग्रेस अध्यक्ष बने रहते हैं, तो पार्टी में यथास्थिति ही बरकरार रहेगी, तो फिर किसी बदलाव की उम्मीद करना ही बेमानी है। बहरहाल दो दिनों की मशक्कत, मान-मनुहार के बाद भी संशय है कि राहुल गांधी के इस्तीफे की नियति क्या हुई? अलबत्ता प्रवक्ताओं की भाषा है कि उन्हें आमूल परिवर्तन और संरचना के लिए अधिकृत कर दिया गया है। घूम-फिर कर सवाल वही उभरता है कि क्या गांधी परिवार के नेतृत्व के बिना कांग्रेस का अस्तित्व और उसका पुनरोत्थान संभव है? दरअसल कांग्रेस कभी भी ‘गांधी-मुक्त’ नहीं होना चाहेगी। यह फार्मूला कांग्रेसियों का ही है। यदि 1991 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी की हत्या के बाद पीवी नरसिंहराव को कांग्रेस अध्यक्ष बनाना पड़ा, तो उसका कारण यह था कि उन्हें प्रधानमंत्री चुन लिया गया था। राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस नेताओं ने सोनिया गांधी की चौखट खटखटाई थी कि पार्टी का नेतृत्व करें। उनके साफ इनकार करने के बाद नरसिंहराव पर सहमति बनी। उनके बाद सीताराम केसरी भी कांग्रेस अध्यक्ष रहे। कांग्रेसियों ने उनकी क्या दुर्दशा की थी, इतिहास में सब कुछ दर्ज है, क्योंकि तब सोनिया गांधी ने कांग्रेस का नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया था, लिहाजा गैर-गांधी अध्यक्ष को उठाकर फेंक दिया गया। 2004 के अप्रत्याशित जनादेश के बाद सोनिया गांधी पर ही प्रधानमंत्री बनने के दबाव थे। हालांकि कांग्रेसी जानते थे कि संविधान इसकी अनुमति नहीं देता, लेकिन पार्टी में ‘चमचागीरी संस्कृति’ भी ऐतिहासिक है। दरअसल गांधी परिवार ही गांधी परिवार के बारे में अंतिम निर्णय ले सकता है। कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को परिवारवाद या पुत्रहित पर खरी-खोटी सुना लें या शिकवा करें कि ‘चौकीदार चोर है’ के अभियान पर पार्टी के बड़े नेताओं ने उनका पुरजोर समर्थन नहीं किया, लेकिन राहुल का यह नारा ‘राजनीतिक अपरिपक्वता’ का उदाहरण था। देश के जनादेश के बाद तो उन्हें स्पष्ट हो गया होगा। लिहाजा कांग्रेस के भीतरी हाहाकार या पार्टी के चुनावी मजाक के लिए गांधी परिवार को जिम्मेदारी लेनी चाहिए और सड़कों पर निकलना चाहिए। चुनाव कौन नहीं हारा है? भाजपा मात्र दो सांसदों तक पहुंच चुकी है और आज 303 सांसद हैं। आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी 15 महीने की पदयात्रा के बाद चुनाव जीत कर सरकार बना सकते हैं और 25 में से 22 सांसद जीत कर लोकसभा में आ सकते हैं, तो कांग्रेस का पुनरोत्थान क्यों नहीं हो सकता? नेतृत्व आगे बढ़कर राहुल गांधी को ही करना पड़ेगा, लेकिन अपनी टीम और सलाहकार चुनने में वह गंभीर बौद्धिक चिंतन करें। लोकसभा चुनाव तो संपन्न हो चुका, लेकिन कुछ ही महीनों में हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र सरीखे राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। उन राज्यों में भी भाजपा सत्तारूढ़ है। भाजपा के पास संसाधनों के खजाने हैं और चुनाव जीतने का अपार उत्साह भी है, लिहाजा ये चुनाव भी कांग्रेस के लिए गंभीर चुनौती हैं। देश की प्राचीन पार्टी होने के नाते कांग्रेस को अपने अंतर्विरोधों से लड़ना होगा और चुनावी हार के सदमे को झाड़ना होगा। यह बाद में कभी तय किया जा सकता है कि पार्टी का नेतृत्व कौन करे और बदलाव क्या-क्या हों।

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