गीता रहस्य

स्वामी रामस्वरूप

जब ईश्वर की शक्ति मात्र अदर्शनीय जड़ प्रकृति में कार्य करती है तब प्रकृति से महत  अहंकार आदि तत्त्वों की रचना होते-होते पंचभूत एवं समस्त सृष्टि के पदार्थ सूर्य, चंद्रमा, जल-वायु प्राणियों के शरीर आदि बनते हैं। उसी सत्य को श्रीकृष्ण महाराज ने यहां ज्यों का त्यों कह दिया…

श्लोक 9/10 में श्रीकृष्ण महाराज अर्जुन से कह रहे हैं कि हे अर्जुन ! मेरे अध्यक्ष अर्थात स्वामी होने से रज,तम,सत इन तीन गुणों वाली प्रकृति चर और अचर जगत को उत्पन्न करती है। इस कारण से संसार चक्र घूमता है।

भावार्थ- ऋग्वेद मंत्र 10/129/3 में कहा कि जब पिछली सृष्टि नष्ट हो चुकी थी और वर्तमान सृष्टि की रचना नहीं हुई थी तब केवल एक तत्त्व स्वयंभू चेतन, जीता जागता परमेश्वर ही था। दूसरा तत्त्व प्रकृति एवं तीसरा अनंत चेतन जीवात्माएं थीं जो सृष्टि रचना होने पर कर्मानुसार शरीर धारण करती  हैं। जब सृष्टि रचना से पहले कुछ भी नहीं था, तब मंत्रानुसार प्रकृति जो सृष्टि का उपादान कारण है, उस उस प्रकृति से ईश्वर सृष्टि रना करता है। अतः स्पष्ट रूप से ऋग्वेद मंत्र 10/129/7 में ‘यः अस्य अध्यक्षः इसं विसृष्टिः यतः आबभूव परमे व्योमन’ अर्थात यह विवध रूप वाली सृष्टि जिस उपादान कारण से उत्पन्न होती है, उस उपादान कारण अर्थात अव्यक्त प्रकृति का अध्यक्ष/ स्वामी स्वयं परमेश्वर है। भाव यह है कि उन्हीं ऋग्वेद में कहे अध्यक्ष एवं प्रकृति शब्दों का प्रयोग श्रीकृष्ण महाराज ने श्लोक 9/10 में करते हुए कहा है कि हे अर्जुन ! मैं इस प्रकृति का अध्यक्ष हूं और यह प्रकृति चर और अचर जगत को उत्पन्न करती है। वेदों में कई जगह समझाया गया है और इसका वर्णन गीता के कई श्लोकों में भी किया गया है। जब ईश्वर की शक्ति मात्र अदर्शनीय जड़ प्रकृति में कार्य करती है तब प्रकृति से महत अहंकार आदि तत्त्वों की रचना होते-होते पंचभूत एवं समस्त सृष्टि के पदार्थ सूर्य, चंद्रमा, जल-वायु प्राणियों के शरीर आदि बनते हैं।उसी सत्य को श्रीकृष्ण महाराज ने यहां ज्यों का त्यों कह दिया। सब जानते हैं कि जगत का एकदिन नाश होता है और उस समय सारा संसार नष्ट होकर पुनः अदर्शनीय प्रकृति का रूप धारण कर लेता है अर्थात सृष्टि रचना, पालना, प्रलय एवं पुनःसृष्टि रचना, यह ईश्वर का दिव्य कर्म अनादि काल से चला आ रहा है और सदा रहेगा।   

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