गीता रहस्य

स्वामी रामस्वरूप

श्लोक 9/10 में भी श्रीकृष्ण महाराज ऋग्वेद मंत्रों के आधार पर सृष्टि की उत्पत्ति निराकार एवं अजन्मा ईश्वर तथा प्रकृति, दोनों के कारण ही कह रहे हैं। परंतु यह सब भेद तब तक छुपे ही रहेंगे जब तक संसार विद्वान आचार्य से श्रीकृष्ण की भांति चारों वेदों को नहीं सुन लेगा…

गतांक से आगे…

इसे ही श्रीकृष्ण महाराज ने ‘विपरिववर्तते’ पद से समझाते हुए कहा है कि हे अर्जुन !  प्रकृति से रचना एवं नाश निश्चित समय पर स्वाभाविक रूप से होते रहते हैं। इसे ही पृथ्वी चक्र अथवा संसार का बनाने-बिगाड़ने वाला(विपरिवर्तते) चक्र कहा है। श्रीकृष्ण महाराज ने यहां ‘मया अध्यक्षेण’ शब्दों का प्रयोग सिद्ध पुरुष होने के नाते ब्रह्म के समान वाली अवस्था में प्रेम मग्न होकर ईश्वर की ओर से कहा है। अर्थात श्रीकृष्ण महाराज ईश्वर नहीं है परंतु ईश्वर में लीन, ईश्वर कृपा से ईश्वर के समान है। रचना,पालना, प्रलय तो निराकार ईश्वर ही करता है अन्य कोई नहीं कर सकता। इसी कारण श्रीकृष्ण महाराज ने भी स्थान-स्थान पर  वेद मंत्रों के आधार पर उसी निराकार, सर्वव्यापक ईश्वर के विषय में कहा है। श्लोक 9/10 में भी श्रीकृष्ण महाराज ऋग्वेद मंत्रों के आधार पर सृष्टि की उत्पत्ति निराकार एवं अजन्मा ईश्वर तथा प्रकृति, दोनों के कारण ही कह रहे हैं। परंतु यह सब भेद तब तक छुपे ही रहेंगे, जब तक संसार विद्वान आचार्य से श्रीकृष्ण की भांति चारों वेदों को नहीं सुन लेगा। वेद सुनने के पश्चात ही यह समझ में आता है कि ईश्वर निराकार, अनादि, सर्वव्यापक, अजन्मा सदा एक रस रहने वाला अर्थात निराकार रूप को बदल कर साकार रूप में नहीं आने वाला, अनंत गुणों से युक्त, सर्वशक्तिमान तत्त्व है। आओ हम वेदों को सुनना  प्रारंभ करें। श्लोक 9/11 में श्रीकृष्ण महाराज अर्जुन से कह रहे हैं कि अज्ञानी लोग मेरे सब भूतों अर्थात सब प्राणियों में महान परम भाव को न जानते हुए मुझको मनुष्य का शरीर धारण किया हुआ जानकर अवज्ञा करते हैं।

भाव- यह है कि प्रकृति से पांच तत्त्व बनते हैं, जिन्हें पंच भूत कहते हैं। इन्हीं पांच भूतों से समस्त संसार के पदार्थ और प्राणियों के शरीर बनते हैं। इसी विषय में यजुर्वेद मंत्र 40/1 में कहा कि ‘ईशा वास्यामिंद सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत’ अर्थात पंच भूतों द्वारा ईश्वर से रचित जड़ एवं चेतन दोनों जगत है जिसमें ईश्वर समाया हुआ है अर्थात ईश्वर सर्वव्यापक है।                   

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