गीता रहस्य

स्वामी रामस्वरूप

श्रीकृष्ण महाराज ईश्वर के दिव्य गुणों का वर्णन कर रहे हैं कि ईश्वर प्रकृति द्वारा रचित अग्नि, वायु, जल, आकाश, पृथ्वी यह पांच भूत और इन पांच भूतों से रचित संसार जिसमें जड़ और चेतन दोनों जगत आ जाते हैं। उन सबका स्वामी एक ही ईश्वर है और वह ईश्वर संसार के प्रत्येक पदार्थ में निवास करता है अर्थात ईश्वर सर्वव्यापक है…

ईश्वर पांच भूतों से रहित संसार का स्वामी है। अतः पंच भूतों से रहित चेतन, दोनों  जगत से महान है। जैसा कि यजुर्वेद मंत्र 13/4 में कहा है ‘हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातःपतिरेक आसीत। अर्थात – वह ज्योति स्वरूप ईश्वर सबको ज्योति देने वाला, पंच भौतिक पदार्थों से रचित संसार के पदार्थों का प्रसिद्ध मालिक था और इस संसार रचना से पहले भी वह परमेश्वर ही था। इसी वैदिक भाव को श्लोक 9/11 में श्रीकृष्ण महाराज ने ‘भूत महेश्वरम’ संपूर्ण भूतों से रचित संसार का एक ही परमेश्वर कहा है और जैसा यजुर्वेद मंत्र 27/36 में कहा ‘न जातः न जनिष्यते’ उस ईश्वर के समान न कोई उत्पन्न हुआ है और न होगा।  अतः श्रीकृष्ण महाराज ईश्वर के दिव्य गुणों का वर्णन कर रहे हैं कि ईश्वर प्रकृति द्वारा रचित अग्नि, वायु, जल, आकाश, पृथ्वी यह पांच भूत और इन पांच भूतों से रचित संसार जिसमें जड़ और चेतन दोनों जगत आ जाते हैं। उन सबका स्वामी एक ही ईश्वर है और वह ईश्वर संसार के प्रत्येक पदार्थ में निवास करता है अर्थात ईश्वर सर्वव्यापक है। वेद में यह कहा है कि वही निराकार परमेश्वर किसी भी तपस्वी, योगी के शरीर में ही वेदाध्ययन एवं योग साधना आदि करने के पश्चात प्रकट होता है। श्रीकृष्ण महाराज जो एक सिद्ध पुरुष हैं उनमें भी साक्षात परमेश्वर प्रकट था। ऐसे दिव्य पुरुष जो ब्रह्मलीन है, उनको साधारण नर-नारी जो विद्या से हीन हैं, समझ नहीं पाते अर्थात यह नहीं समझ पाते कि इस दिव्य पुरुष में ब्रह्म प्रकट है और इनकी प्रत्येक बात ब्रह्म के समान ही कही होती है। पुनः न समझने का कारण श्रीकृष्ण महाराज पूर्णतः स्पष्ट करते हुए कह रहे हैं कि ‘मूढ़ा’ः अर्थात वेद एवं योग-विद्या न जानने वाले अज्ञानी पुरुष इसलिए भी मुझे नहीं जानते कि मैंने शरीर धारण किया हुआ है और निश्चित ही शरीर तो मनुष्य धारण करते हैं। ईश्चर तो योगी के शरीर में प्रकट होते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण जैसे योगी की भी उस समय लोग अवज्ञा कर देते थे।                             

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