गुणात्मक शिक्षा का कंटीला मार्ग

राजेश शर्मा

लेखक, शिमला से हैं

 

हमारी शिक्षा नीति बेशक सुदृढ़ मानी जाती हो, परंतु जिस प्रतिफल की हम कामना कर रहे हैं, हर मां-बाप जो गुणात्मक शिक्षा के सपने बुनकर अपने बच्चों को राम बनाने की खातिर स्कूलों का रास्ता दिखा रहे हैं, वे सभी सपने, बच्चों के उज्ज्वल भविष्य निर्माण के लिए बनने वाले सभी मनसूबे मिट्टी में मिलते दिखाई देते हैं। यदि लाचार व्यवस्था को पटरी पर लाना है, तो सरकार को चाहिए कि शिक्षा नीति में आवश्यक सुधार करे…

आज के युग में राम सरीखे चरित्र व व्यवहार का सृजन करना असंभव है। रावण बनना आसान है, परंतु राम बनना कठिन है। लोभ और अहंकार के इस काल में सद्गुणों का अकाल है। मोह और लिप्सा में डूबी महत्त्वाकांक्षाएं समाज के भीतर घृणित और दूषित विचारों और संस्कारों की कर्णधार बनी हैं। शिक्षा जो नैतिक सुविचारों और विचारधाराओं का स्रोत मानी जाती है, आज समाज के अंदर सामाजिक मूल्यों की स्थापना करने में असमर्थ है। सब जानते हैं कि शिक्षा का स्तर गिर रहा है। क्यों गिर रहा है, इसका सही कारण ज्ञात करना कठिन है। सरकारों ने कई कोशिशें कर लीं, विचारकों ने कई धारणाएं बना लीं, परंतु आज भी गुणात्मक शिक्षा के सपने को साकार करना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। आज शिक्षा जिस मत का अनुसरण कर रही है, वह मत एक विद्यार्थी को अर्थव्यवस्था में इस्तेमाल होने वाले पुर्जे के निर्माण में तो समर्थ लगता है, परंतु समाज निर्माण में उसकी भूमिका नगण्य है। समाज में कलह बढ़ रही है। जुर्म और गुनाहों की कहानियां गढ़ी जा रही हैं। अनैतिकता की हदों से आगे भी हदें बन रही हैं। ऐसे माहौल में सभी की अंगुलियां शिक्षा की उदारता पर उठती नजर आती हैं। हर निगाह सरकार की गुणात्मक शिक्षा नीति की ओर निहार रही है, पर उदार कहीं दिखता नहीं।

यह विदित है कि हर काल में मानव मूल्यों का संकलन व संचालन शिक्षा प्रणाली का मूल उद्देश्य रहा है और इसी उद्देश्य को हासिल करने के लिए समय-समय पर सरकार द्वारा शिक्षा पद्धति में कई प्रकार के फेरबदल किए गए। शिक्षा को सुगम बनाने के लिए हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा हर गांव-कस्बे में विद्यालयों की स्थापना की गई। सन् 1953 में एक एक्ट के तहत हिमाचल प्रदेश में अनिवार्य शिक्षा का अध्याय जोड़ा गया। इस समय सरकार द्वारा शिक्षा के  क्षेत्र में कई सुविधाएं मुफ्त प्रदान की जा रही हैं। मुफ्त वर्दी, किताबें, दोपहर का भोजन, नाममात्र की फीस, परंतु खेद का विषय यह है कि सरकार द्वारा सुविधाएं देने के बावजूद सरकारी स्कूलों की हमेशा ही आलोचना होती रही है। सरकार का गुणात्मक शिक्षा का लक्ष्य अभी काफी दूर नजर आता है। ऐसा क्यों है कि लोग सरकारी स्कूलों का रास्ता छोड़ कर निजी विद्यालयों की ओर अपना रुख कर रहे हैं, जिस कारण सरकारी स्कूल संकट से गुजर रहे हैं। स्कूलों में शिक्षकों की कमी के चलते लगातार घटती विद्यार्थियों की संख्या, हर सरकारी स्कूल की व्यथा बन गई है। सरकारी शिक्षा की लगातार गिरती छवि सरकारी शिक्षा की कार्यप्रणाली पर ताने कस रही है। यह चिंतन का विषय है कि सरकारी शिक्षा तथा शिक्षा पद्धति के प्रति लोगों का प्रतिकूल रवैया क्यों है। इसके कारणों की विवेचना होना अति आवश्यक है। यदि हम सरकारी स्कूलों की कार्यप्रणाली पर नजर डालें, तो हम पाते हैं कि गिरते शिक्षा स्तर का मूल कारण यह है कि हमारे अपने सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षक समाज में गलत संदेश दे रहे हैं। इस बात की पड़ताल होनी चाहिए कि हिमाचल प्रदेश के अंदर कितने सरकारी शिक्षक ऐसे हैं, जिनके अपने बच्चे निजी शिक्षा संस्थानों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। सरकारी शिक्षा को सुदृढ़ बनाने की राह में यह सबसे बड़ा नकारात्मक तत्त्व है। जो शिक्षक दूसरों के बच्चों को गुणात्मक शिक्षा का सपना दिखा रहे हैं, वे शिक्षा का बेड़ा गर्क करने में स्वयं संलिप्त हैं। सवाल यह है कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में शिक्षा दिलाने के लिए बाध्य क्यों नहीं हैं? दूसरी बात यह है कि हम जिन मूल्यों की स्थापना के लिए सतत प्रयास कर रहे हैं, उन मूल्यों का व्यावहारिक पक्ष क्या है। हमारा विद्यार्थी, जो हर सुबह स्कूल में जाकर यह प्रतिज्ञा लेता है कि वह तन-मन-धन से देशहित के लिए कार्य करेगा, अपने से बड़ों का सम्मान व आदर करेगा, कितने बच्चे, कितने शिक्षक इस प्रतिज्ञा का अनुसरण करते हैं, तो कितने लोग देशभक्त बनते हैं, कितने लोग समाजसेवा के लिए आगे आते हैं, कितने लोग अपने बड़े-बूढ़ों का आदर-सम्मान करते हैं? कहने का तात्पर्य यह है कि तंत्र पर जब तक औपचारिकताओं की सिलवटें रहेंगी, तब तक नैतिक व सामाजिक मूल्यों की परिभाषा अवसरवादी विचारों में उलझी रहेगी।

शिक्षा के गिरते स्तर का कारण सरकारों और शिक्षकों की उदासीनता के पिछवाडे़ में विचरण करता रहेगा। एक अन्य बात जो गौरतलब है कि सरकार द्वारा जिस प्रकार शिक्षकों का दोहन हो रहा है, उससे स्पष्ट होता है कि शिक्षा क्षेत्र में औपचारिकताओं का प्रादुर्भाव होना स्वाभाविक है। हिमाचल प्रदेश के अंदर शिक्षक जिस तरह से कोल्हू के बैल की तरह पिस रहा है, उससे लगता है कि गुणात्मक शिक्षा की कामना करना व्यर्थ है। आज शिक्षक न केवल शिक्षा विभाग का कार्य देख रहा है, बल्कि निर्वाचन आयोग, सर्वेक्षण विभाग, शिक्षा बोर्ड, सभी के कार्यों का जिम्मा उसके सिर पर है। बचे हुए समय में वह बच्चों को शिक्षा के प्रति कितना केंद्रित कर पाता है, कह नहीं सकते। ठीक यहीं से शिक्षा में औपचारिकताओं की कहानी शुरू होती है। गुणात्मक शिक्षा प्रदान करने के जिस प्रबल उद्देश्य के साथ एक शिक्षक की यात्रा शुरू होती है, वह बोझिल कार्यों तथा गैर शिक्षक कार्यों की थकान में गुम हो जाती है। जब हर तरह के गुणा-बाट करके प्रतिफल शून्य निकले, तो व्यवस्था को बदलना बहुत जरूरी हो जाता है।

हमारी शिक्षा नीति बेशक सुदृढ़ मानी जाती हो, परंतु जिस प्रतिफल की हम कामना कर रहे हैं, हर मां-बाप जो गुणात्मक शिक्षा के सपने बुनकर अपने बच्चों को राम बनाने की खातिर स्कूलों का रास्ता दिखा रहे हैं, वे सभी सपने, बच्चों के उज्ज्वल भविष्य निर्माण के लिए बनने वाले सभी मनसूबे मिट्टी में मिलते दिखाई देते हैं। यदि लाचार व्यवस्था को पटरी पर लाना है, तो सरकार को चाहिए कि शिक्षा नीति में आवश्यक सुधार करे। जब तक गणित का शिक्षक समाज की कक्षा लेता रहेगा, गैर शिक्षक कार्यों में अपना दिमाग खपाता रहेगा, तब तक शिक्षा पर औपचारिकताओं के बादल मंडराते रहेंगे और गुणात्मक शिक्षा का सपना, एक सपना बनकर रह जाएगा।

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