गुरु की परीक्षा

स्वामी विवेकानंद

गतांक से आगे…

यह कैसा अनोखा पागलपन है। मैं कहां विश्वनाथ दत्त का पुत्र और कहां इनकी ये सब बातें। श्रीरामकृष्ण इसके बाद फिर से भक्तों के बीच लौटकर स्वाभाविक रूप से बातचीत करने लगे, तो नरेंद्र ने उनकी विशेष रूप से परीक्षा करके देखा। उनके चाल- चलन और बातों से पागलपन का लेशमात्र भी इशारा नहीं हो रहा था। उनकी बातों को असंबंद्ध प्रलाप कहकर उड़ा देना आसान नहीं था। तब फिर उसमें क्या गंभीर रहस्य है? यह सोच-सोच कर जब वह थक गए, तो संन्यासी से विदा ले वो घर लौटे। नरेंद्र की बुद्धि भी श्रीरामकृष्ण जैसे महान देवमानव के चरित्र का विश्लेषण करने में असक्षम रही। कठिन उलझन में पड़कर नरेंद्र एकाएक कोई भी विचार मन में स्थिर न कर सके। अपने दिल ही दिल में उन्होंने सोचा इनकी अच्छी तरह परीक्षा लिए बिना, उन्हें कभी ईश्वरवादी महापुरुष न मानूंगा। मगर इस घटना के बाद से ही वो एक प्रबल आकर्षण का अनुभव करने लगे कि बीच-बीच में मजबूर होकर दक्षिणेश्वर के उस पागल पुजारी के चरणों में उपस्थिति होना ही पड़ता था। श्रीरामकृष्ण का अपूर्व त्याग, शिशु की भांति अभिमानशून्य सरल व्यवहार, विनम्र मधुर वाक्य और सबसे ज्यादा उनके गंभीर निष्काम प्रेम ने नरेंद्र नाथ के दिल पर थोड़े ही दिनों में काफी असर डाला। नरेंद्र ने जब यह देखा कि महापुरुष की दया से अनेक लोगों के जीवन इसके अहसानमंद और धन्य हो गए हैं, लेकिन फिर भी वो इन्हें एकाएक अपने जीवन का आदर्श नहीं मान सके थे। यहां तक कि लगातार तीन साल तक विभिन्न प्रकार से उनकी परीक्षा लेने के बाद आखिर में उन्होंने उनके श्रीचरणों में संपूर्ण आत्मसमर्पण किया था। नरेंद्र को निराकार का ध्यान ही अच्छा लगता था। श्रीरामकृष्ण उन्हें उसी भाव का उपदेश दिया करते थे। कभी जबरदस्ती उनको साकार में विश्वास करने के लिए अनुरोध नहीं करते, यहां तक कि उन्होंने कभी भी नरेंद्र को ब्रह्म समाज में जाने से भी नहीं रोका और कभी किसी की आजादी व धर्मचरण में हस्तक्षेप नहीं किया। नरेंद्रनाथ बार-बार यही बात सुनकर इसका यकीन नहीं करते थे कि वो अधिकारी पुरुष हैं और जगदंबा की खास कार्यसिद्धि के उद्देश्य से अवर्तीण हुए हैं। एकदिन दक्षिणेश्वर में केश्व विजय आदि ब्रह्म नेतागण बैठे थे, उस वक्त नरेंद्र भी वहां मौजूद था। श्रीरामकृष्ण भावस्थ होकर उन्हें देखने लगे। आखिर में जब केश्व और विजय विदा हो गए, तो वो सभी भक्तों से बोले, भाव में मैंने देखा है कि केश्व ने जिस शक्ति बल के द्वारा प्रतिष्ठा प्राप्त की है, नरेंद्र में उस प्रकार की 18 शक्तियां मौजूद हैं। केश्व और विजय के मन में ज्ञानद्वीप जल रहा है और नरेंद्र के मन में सूर्य विद्यमान है। इतनी तारीफ सुनने के बाद कोई भी व्यक्ति घमंड से अपनी छाती फुला लेता, इसमें शक नहीं, लेकिन नरेंद्र ने उसी समय प्रवाद करके कहा, क्या कहते हैं आप?  कहां विश्वविख्यात केश्व सेन और कहां एक नगण्य, स्कूल का लड़का नरेंद्र। लोग सुनेंगे, तो उपहास नहीं करेंगे, बल्कि आपको पागल समझेंगे। इतना सुनते ही रामकृष्ण ने हास्य कर सरल भाव से जवाब दिया, मैं क्या करूं, मां ने दिखा दिया, इसलिए ऐसा कहता हूं। श्रीरामकृष्ण जगमाता की दुहाई देकर भी नरेंद्र की एक आलोचना से छुटकारा नहीं पा सकते थे।                                           

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