चुनावी दौर की नजदीकियां

चुनाव के अंतिम चरण में अचानक हिमाचल का कद ऊंचा हो गया या देश की सियासत ने भी पर्वत की चांदनी देख ली। मंडी और ऊना में राष्ट्रीय राजनीति के दीदार कुछ इस तरह हुए कि भाजपा और कांग्रेस फिर आकाश में खड़ी दिखाई दीं। यहां कौन किसके मुकाबले क्या अर्जित कर पाया मापना कठिन है, लेकिन राष्ट्रीय संवेदना ने छोटे से राज्य का सीना जरूर फुला दिया। इसलिए नारेबाजी ऊना में हुई, तो मंडी भी आत्मविभोर रही या देश के प्रधानमंत्री ने फुर्सत से हिमाचल को अपना नूर बता दिया। हिमाचल में फिर अटल लौट आए और इसी रुतबे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी रिश्तों की सियासी फितरत तय की। सुनने वाले के लिए बहुत कुछ था और बड़े कसीदे से प्रधानमंत्री ने अपने भाष्य को हिमाचल के कानों में डाल दिया। हिमाचली कान तो ऊना की तरफ लगे रहे और उस गुणगान को भी सुन रहे थे, जो वीरभद्र की अहमियत को फिर बढ़ा गया। दो रैलियों  के बीच हिमाचल ने अपनी सियासत को कितना परिपक्व किया या पृष्ठभूमि से निकले नेता कितना आगे बढ़े, लेकिन चुनावी दौर की नजदीकियां अब गुनगुना रही हैं। ऐसे में पहला सवाल भाजपा खुद से पूछ रही है कि इस बार पिछली सफलता से कितनी सफलता लौटती है। यानी अपना सौ फीसदी भाजपा को देने वाला हिमाचल, क्या इस बार भी पार्टी के लिए परिणाममूलक रहेगा। दूसरी ओर कांग्रेस अपनी तमाम गांठें खोलकर विजयी पताका अपने हाथ से उठाना चाहती है, ताकि खो चुका अतीत फिर से जगमगाए। इसलिए राहुल गांधी की रैली का केंद्र बिंदु अगर प्रधानमंत्री के व्यवहार और उवाच की शिकायत कर रहा था, तो मंडी में नरेंद्र मोदी जनता के दिल पर हाथ रख रहे थे। वह अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत ओढ़ कर रोहतांग टनल के उद्घाटन तक रैली का मुकाम देख रहे थे, तो राहुल गांधी ने भी अपने परिवार से हिमाचल के रिश्ते जोड़े। इसमें दो राय नहीं कि कमोबेश हर प्रधानमंत्री ने हिमाचल की पलकें खोलीं। पूर्ण राज्यत्व की डगर पर अगर स्व. इंदिरा गांधी का साथ मिला, तो इससे पूर्व बांध परियोजनाओं में नेहरू का दौर जुड़ता है। औद्योगिक पैकेज के जरिए हुआ निवेश अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति हिमाचल की कृतज्ञता प्रकट करता है। अब इसी तरह से हिमाचल क्या नरेंद्र मोदी को अपने नजदीक देख पाया। लोकसभा चुनाव के दो दौरों से जुड़े नरेंद्र मोदी के संकल्प, पहली बार सुजानपुर में जो सुना गए, क्या अब मंडी ने भी वही सुने। बेशक केंद्रीय योजनाओं में जो इजाफा हुआ, उसमें हिमाचल भी लाभान्वित है। ‘वन रैंक-वन पेंशन’ का रू-ब-रू होना, हिमाचल को छूता है। सरहद पर बहादुरी के किस्से या राष्ट्रवाद की संवेदना सदैव हिमाचल से जुड़ती है, लेकिन जब राजनीति में ‘नन्हा’ प्रचारित किए गए राहुल गांधी अपने स्वर्गीय पिता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर की गई असंयमित तथा अवांछित टिप्पणियों का जिक्र करते हैं, तो हिमाचल को अच्छा नहीं लगता। ऊना में राहुल गांधी ने हिमाचली विमर्श को छुआ है। अपनी परिपक्वता का प्रदर्शन किया और खुद को उस केंद्र में छोड़ गए, जहां हिमाचली मतदाता जागरूक स्वभाव से विचार करता है। मंडी की विशाल रैली में प्रधानमंत्री ने पंडित सुखराम को अनछुआ छोड़ दिया, तो चुनाव की यह फितरत सिर खुजाने पर मजबूर करती है। मंडी रैली की क्षमता में भाजपा के सामने हैट्रिक का संदेश छोड़ कर मोदी ने अपना लक्ष्य बता दिया और यह भी कि अंतिम चरण की ये चार सीटें अबकी बार पार्टी के लिए कितनी आवश्यक हैं।

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