चुनाव आयोग की कैंची

चुनाव आयोग के एक पर्यवेक्षक ने रपट दी थी कि पश्चिम बंगाल के हालात वैसे ही बन गए हैं, जैसे 15 साल पहले बिहार के होते थे। बंगाल में प्रशासन और पुलिस का इस कद्र राजनीतिकरण कर दिया गया है कि निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव संभव नहीं हैं। यदि चुनाव आयोग अपने पर्यवेक्षक की रपट पर भरोसा कर तुरंत कार्रवाई करता, तो शायद बंगाल इतना न तपता और सुलगता। बंगाल हिंसा की लपटों में जलने और विभाजक धु्रवीकरण से बच सकता था, लेकिन आयोग ने विलंब से ही सही, एक अभूतपूर्व फैसला लिया है। संभवतः संविधान के अनुच्छेद 324 का पहली बार इस्तेमाल करते हुए चुनाव प्रचार को एक दिन पहले ही रोकने का आदेश दिया है। बंगाल में रैली, सभा, रोड-शो और किसी भी तरह के चुनाव प्रचार पर ‘कैंची’ चलाते हुए पूरी पाबंदी चस्पां कर दी गई है। जो प्रचार 17 मई की शाम छह बजे थमना था, उसे 16 मई रात्रि 10 बजे ही रोक दिया गया है। अब न तो कोई रैली की जा सकेगी, न किसी जनसभा में लोग शिरकत कर सकेंगे, न ही कोई नेता (प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री) जनता को संबोधित कर सकेगा और न ही राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन के मद्देनजर कोई रोड-शो आयोजित किया जा सकेगा। यह पाबंदी 19 मई को शेष नौ सीटों पर मतदान संपन्न होने तक जारी रहेगी। ममता बनर्जी ने त्वरित टिप्पणी करते हुए चुनाव आयोग के इस निर्णय को ‘अनैतिक’ और ‘असंवैधानिक’ करार दिया है। उनका आरोप है कि प्रधानमंत्री मोदी के निर्देश पर यह फैसला लिया गया है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी आयोग को धमकी दी थी, लेकिन इस तरह भी मोदी और भाजपा जीत नहीं सकते। ममता ने अपने ‘कपड़े फाड़’ अंदाज में इसे बंगाल अस्मिता का मुद्दा बनाने की कोशिश की है और जनता का आह्वान किया है कि मोदी को सत्ता से हटाओ… भाजपा को एक वोट भी नहीं देना है। बहरहाल बंगाल में प्रत्येक चरण के चुनाव के दौरान हिंसा भड़कने के मद्देनजर आयोग को यह फैसला लेना पड़ा है। हरेक चरण के मतदान के दौरान व्यापक हिंसा ही नहीं हुई, बल्कि बूथ लूटे गए, कानून-व्यवस्था और लोकतंत्र का उल्लंघन किया गया। ऐसा लगता रहा मानो यह चुनाव नहीं, कोई जंग या गैंगवार लड़ा जा रहा हो! ममता ने भाजपा को दोषी करार दिया और भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस को ‘हिंसक’ साबित करने की शिकायतें कीं। अंततः यह निर्णय अंतिम और सातवें चरण के मतदान से पूर्व लिया गया है। चुनाव आयोग लगातार खामोश एवं सवालिया कैसे रह सकता था? सिर्फ यही नहीं, चुनाव आयोग ने प्रदेश सरकार के प्रधान गृहसचिव, गृहसचिव, पुलिस आयुक्त की छुट्टी करने का फैसला भी लिया। मुख्यमंत्री के लाडले अफसर एवं सीआईडी के एडीजी राजीव कुमार को गृह मंत्रालय में तुरंत तलब किया गया है। ममता को ऐसा एहसास हो रहा होगा मानो बंगाल में राष्ट्रपति शासन चस्पां कर दिया है! दरअसल यह निर्णय चुनाव आयोग को तब लेना पड़ा, जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के रोड-शो के दौरान उन पर जानलेवा हमले की कोशिश की गई और उन्हीं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई। जेड प्लस सुरक्षा के बावजूद अमित शाह को निशाना बनाया गया। उनका मानना है कि यदि सीआरपीएफ की सुरक्षा न होती, तो जिंदा बचकर निकलना मुश्किल था। यानी बंगाल ने सुरक्षा व्यवस्था में अपना दायित्व नहीं निभाया। बेशक केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती हो, लेकिन उन्हें स्थानीय पुलिस बल की जरूरत होती ही है, क्योंकि केंद्रीय बल स्थानीय रास्तों और जरूरतों से वाकिफ नहीं होते। चुनाव के दौरान भी सुरक्षा व्यवस्था का बुनियादी दायित्व राज्य सरकार का होता है। लिहाजा रोड-शो के दौरान जो डंडे फेंके गए, पत्थर मारे गए, बम के इस्तेमाल किए गए और अंततः महान समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर की प्रतिमा खंडित कर दी गई। प्रतिमा कालेज के भीतर कमरे में बंद थी और प्रशासनिक अधिकार भी ममता की पार्टी के पास थे। सवाल जांच और विमर्श का है कि मूर्ति को तोड़ने की नौबत क्यों और कैसे आई? आयोग इस पर न्यायिक जांच बिठा सकता है। ममता ने इसे भी बंगाल और बंगालियों के सम्मान का मुद्दा बनाने की कोशिश की है। एक तरफ भाजपावाले ‘जय श्रीराम’ का नारा लगा रहे हैं, तो जवाब में ‘जय विद्यासागर’ की हुंकार भरी जा रही है। बंगाल में इतनी विभाजक स्थिति क्यों बनी? भाजपा कई और राज्यों में विपक्ष में है और चुनाव जीतने की होड़ वहां भी होगी, लेकिन नफरती हिंसा नहीं फैली। आखिर क्यों…? शायद ममता बनर्जी इन चुनावों में अपने राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं! ऐसा हिंसक माहौल 1977 में तब नहीं हुआ, जब आपातकाल के बाद चुनाव हुए थे। ममता ने प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह दोनों को सार्वजनिक रूप से ‘गुंडा, बदमाश’ कहा है। क्या लोकतांत्रिक भाषा यही है? बहरहाल चुनाव आयोग ने कड़ा कदम उठाते हुए हिंसा का सामूहिक रूप रोकने की कोशिश की है। मतदान भी शांति से होंगे, यही उम्मीद कर सकते हैं।

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