चुनाव प्रचार का अंतिम पहर

रैलियों की ओर सरकता हिमाचल का चुनावी प्रचार जो बड़ी बातें कहने लगा है, उसमें राष्ट्रीय उद्घोष स्पष्ट हैं। यानी जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह रहे हैं, उसी के अनुरूप भाजपा की अपनी बयार है, तो कांगे्रस का जिक्र प्रदेश से देश तक उलझा है। हालांकि मसले राज्य से राष्ट्र तक के हैं, लेकिन प्रचार के प्रहरी एक सूत्र में दिखाई नहीं देते। यहां प्रचार की कठिनता में कांगे्रस का अपना परिदृश्य कहीं असहमति में वीरभद्र के बोल झेलता है, तो प्रदेशाध्यक्ष राठौर की दुनिया से सुखविंद्र सुक्खू की हैसियत का दस्तावेज तारतम्य नहीं बिठाता। अब तक के चुनाव प्रचार के जो भी चेहरे स्पष्ट हुए हैं, उनमें भाजपा ने सारे तरीके आजमा लिए हैं, लेकिन कांग्रेसी मंच की वीआईपी कुर्सियां शांत हैं। कांगे्रस का आश्रय पाकर पंडित सुखराम का हौसला फिर परवान चढ़ रहा है, तो भाजपा के वयोवृद्ध नेता शांता कुमार की सक्रियता में दम है। हालांकि दोनों नेताओं का हालिया प्रदर्शन प्रशंसकों के बीच असमंजस का बोध लिए है, फिर भी चुनावी सुर्खियां इन दोनों नेताओं से भर रही हैं। जिक्र भाषा की मर्यादा को लेकर है, तो गाहे बगाहे शांता कुमार परिवेश से लिपटी राजनीति में सदाचार ढूंढते हुए वीरभद्र सिंह की तारीफ तक पहुंच जाते हैं, लेकिन चुनाव है तो कुछ टेढ़ा भी कहना पड़ेगा। वीरभद्र सिंह इसीलिए आश्रय को पुचकारते हुए  भी आया राम-गया राम की तोहमतों से कांगे्रसी प्रचार में सुराख कर देते हैं। प्रदेश का एक बड़ा हिस्सा पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की प्रचार यात्रा की पदचाप सुनना चाहता है, लेकिन उनकी तवज्जो से सराबोर हमीरपुर संसदीय क्षेत्र फिलहाल लाभान्वित हो रहा है। दो चेहरे इस चुनाव की प्रचार यात्रा से महरूम दिखाई देते हैं, तो लोग कयास लगाते हैं कि डा. राजन सुशांत में कितनी भाजपा बची है या सेवानिवृत्त मेजर विजय सिंह मनकोटिया की कांगे्रस किधर है। इन दोनों नेताओं के पास हमेशा से चुनाव प्रचार की आफत से भरी पुडि़या रही है, लेकिन इस बार फिलहाल माहौल शांत है। प्रतीक्षा अब बड़ी रैलियों की हो रही है और जहां प्रधानमंत्री के अलावा प्रियंका गांधी के रोड शो का इंतजार है। जाहिर है हिमाचली मतदाता प्रचार सामग्री के बीच अपने नेताओं का व्यवहार देखता और इस तरह जागरूकता के नए स्तंभ खड़े होते हैं। भाजपाई दृष्टि से प्रधानमंत्री के संदेश के बाद हिमाचल केवल मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की सुन रहा है। यह इसलिए क्योंकि प्रचार फूंकने की ऊर्जा में उनके व्यवहार का संयम व विवेक पसंद किया जा रहा है, भले ही प्रचार में नरेंद्र मोदी का उल्लेख सबसे ऊपर रह रहा हो। देश से भिन्न और मर्यादित सीमाओं के भीतर हिमाचल की चुनावी फील्ड में भाजपा को अपनी चारों सीटें बचानी हैं, तो कांगे्रस के लिए प्रयोग को परिणाम तक पहुंचाने की मशक्कत है। प्रचार की स्पष्टता के दूसरी तरफ कुछ विधायकों के प्रति आक्रोश, कहीं कानून व्यवस्था, तो कहीं स्थानीय मुद्दे भी प्रचार कर रहे हैं। इन सब के बीच कहीं नोटा खड़ा मुस्करा रहा है, तो कहीं चुनावी बहिष्कार की इबारत में जनता ही दल बन रही है। अब तक के चुनावी प्रचार में राजनीतिक आस्थाओं, राज्य सरकार का कार्यकाल और हिमाचल के बौद्धिक व्यवहार का लेखा-जोखा मुंह नहीं खोल रहा। मुद्दों से खेलती खामोशी और राष्ट्रीय सूचनाओं से छनकर पहुंचता चुनावी हाल, हिमाचल के अपने सरोकारों के संतुलन को एकतरफा नहीं कर पाया। इसलिए रैलियों के रंग में हिमाचल शायद मुखर हो जाए या यह दौर भी शांति से गुजर जाए। बहरहाल चुनाव प्रचार के अंतिम पहर के प्रहार में घायल कौन होता है, देखना बाकी है।

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