जंगल का गीत सुना रहे हैं सुदर्शन वशिष्ठ

कथादेश का मई अंक ‘जंगल का गीत’ लेकर आता है, तो सुदर्शन वशिष्ठ की कहानी किसी पक्षी के मानिंद उड़ान भरती है। यहां हिमाचली विरासत का साहित्य रू-ब-रू होता है, ठीक उस पहाड़ी चिडि़या की तरह, जो परिवेश से तिनके बटोर कर आत्मकथा लिखना चाहती हो। भयावह जंगल के बीच अकेली कहानी अपने भीतर इनसानी फितरत को बाखूबी ओढ़ कर पाठक से संवाद करती है। कहानी जंगल में जन्म लेती है और वहीं अपना ठौर जमाती है। पेड़ को पुकार कर धीमे से कहती है, ‘पेड़ में भी हमारी तरह जान है। पेड़ में भी नसें हैं, हड्डियां हैं, लहू है। पेड़ सांस भी लेता है। अपने ऊपर वार पर वार सहता है, फिर भी कुछ कहता नहीं।’

जंगल को सुनती कहानी उन कंदराओं तक पहुंचती है, जहां माफिया साम्राज्य कायदे-कानून का उल्लंघन करके सशक्त है। यह एक महकमे की परिक्रमा में चीखती-चिल्लाती परिकल्पना नहीं, बल्कि एक हकीकत के सामने लिखी गई सच्चाई भी है। यहां सरकारी कार्यालय का पूरा माहौल, ‘कुर्सी नृत्य’ में जवाबदेही के दाग और अभिशप्त कार्य संस्कृति के गिरते चरित्र की नंगई सामने आती है। कहानी अपनी बुनाई में रिश्तों का रेशम कातती हुई एक गार्ड की बेटी को वन विभाग के उच्च पद पर पहुंचा कर नारी सशक्तिकरण का सुनहरा फ्रेम बना देती है। जज्बात का फौलादी दम और आंखों में बुलंदियों का नूर लिए हुए किस तरह एक महिला फोरेस्ट आफिसर सारे भ्रष्ट माहौल के खिलाफ खड़ी होती है और उन यादों-लम्हों को सूखने नहीं देती, जो उसके बाप ने जंगल की सुरक्षा में कभी मापे थे या वे तमाम आहें जो कभी पिता की शहादत के आंचल में मिलीं। भ्रष्टाचार का मापतोल और भ्रष्ट तंत्र के मायाजाल के बीच कहानी अपनी लंबाई तय करते हुए अनेक प्रश्नों को अपनी रोशनी में कह देती है। कहानी के भीतर औरत का सशक्त होना, बेटी का परवान चढ़ना और महिला अधिकारी का सक्षम बनना इसकी खूबी रही, लेकिन ‘जंगल का संगीत’ कहीं अंत में धीमा पड़ गया। शायद कहानी कुछ और सुना रही होगी, लेकिन लेखक ने विराम देकर पाठक से कुछ पन्ने चुरा लिए।

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