जनप्रतिनिधि काबिल नहीं

 शकुंतला, बद्दी

लोगों ने लोगों के लिए चलाया हुआ राज्य अर्थात लोकतंत्र, ऐसी लोकतंत्र की व्याख्या है, लेकिन लोकतंत्र में जन प्रतिनिधि ऐश-ओ-आराम में हैं और जनता कठिनाइयों का सामना कर रही है। ऐसे जन प्रतिनिधियों पर लोगों का अंकुश रहना आवश्यक है। हमसे कोई भी सवाल करने वाला नहीं है, ऐसी भावना भ्रष्ट, सुस्त जन प्रतिनिधियों में घर कर गई है। भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी जैसे मामलों में सुधार होना असंभव है। हम कहां इनसे लड़ते रहेंगे, ऐसी लोकभावना बन गई है। भारत की जनसंख्या 130 करोड़ से अधिक है। करोड़ों में होने के बावजूद हम कुछ हजार जन प्रतिनिधियों पर अंकुश नहीं रख पाए, यह सोचने वाली बात है। जागरूक नागरिक को क्या करना चाहिए, राष्ट्र के प्रति क्या कर्त्तव्य हैं, ऐसी बातों पर मार्गदर्शन लेने के लिए हिंदू अधिवेशन की तरफ निगाहें लगी रहती हैं। ऐसा अधिवेशन अर्थात नागरिकों के लिए सुवर्ण काल ही है। इस वर्ष यह आठवां अधिवेशन गोवा राज्य में 27 मई से चालू होने वाला है। 

 

 

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