जयराम और सुखराम के बीच घूम रहा मंडी चुनाव

मंडी -राम मंदिर निर्माण के मुद्दे की गूंज इस बार बेशक लोक सभा चुनाव में सुनाई नहीं दे रही है, लेकिन चुनावी महाकुंभ में शिव की नगरी छोटी काशी मंडी राम नाम से जरूर गूंज रही है। छोटी काशी मंडी को शिव की नगरी कहा जाता है और यहां का अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव भी शिव को समर्पित है, लेकिन चुनावी महाकुंभ में पहली बार यहां ऐसा संयोग बना है कि पूरा चुनाव राम नाम के ईदगिर्द घूम रहा है। भाजपा के जयराम और कांग्रेस के सुखराम पर मंडी संसदीय क्षेत्र का चुनाव केंद्रित होकर रह गया है। इन दोनों नामों की ही गूंज इस चुनाव में शुरू से लेकर अब तक सुनाई दे रही है और दोनों के ही नाम राम के नाम से जुडे़ हुए हैं। हालांकि भाजपा प्रत्याशी रामस्वरूप का नाम भी राम के नाम से शुरू होता है, लेकिन उनके लिए चुनाव में मुख्यमंत्री जयराम ही सबसे बडे़ तारणहार बनकर आए हैं। वहीं पहली बार चुनाव लड़ रहे कांग्रेस के आश्रय शर्मा के लिए दादा सुखराम पालनहार बने हैं। हालांकि भाजपा को मोदी फेक्टर ओर आश्रय को वीरभद्र सिंह के वरदान की भी आस है, लेकिन लोक सभा चुनाव की जंग पर शुरुआत से लेकर अब तक नजर डालें, तो मंडी संसदीय क्षेत्र जयराम ठाकुर और पंडित सुखराम के नाम से ही गूंज रहा है। सुखराम के कांग्रेस में लौटने से लेकर अब तक वह भाजपा व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के निशाने पर हैं। सुखराम पर भाजपा न सिर्फ मंडी की चुनावी जनसभाओं में ही वार कर रही है, बल्कि  प्रदेश के अन्य जिलों में भी मुख्यमंत्री की जनसभाओं में सुखराम का नाम सुनाई दे रहा है। इसमें राष्ट्रवाद, परिवारवाद और दलबदलू जैसे मुद्दों पर सुखराम को घेरा जा रहा है। वहीं आश्रय शर्मा इस चुनाव में उतरे ही अपने दादा सुखराम के नाम की पहचान लेकर हैं। चुनाव प्रचार में आश्रय शर्मा सबसे पहले पंडित सुखराम की उपलब्धियों को गिनाने से नहीं चूकते हैं। आश्रय शर्मा तो यहां तक कह रहे हैं कि वह आज अपने दादा सुखराम की पहचान लेकर आए हैं, लेकिन जीत के पांच साल बाद अपनी पहचान लेकर आएंगे। इसके साथ पंडित सुखराम मंडी, कुल्लू के साथ ही जनजातीय क्षेत्रों में भी अपने पौते आश्रय के लिए जनसभाएं कर चुके हैं।

जनता को चुनना है एक राम

दूसरे मुद्दों का नाम ही नहीं मंडी के इस चुनाव जनता में भी राम नाम ही छाया हुआ है। मंडी संसदीय क्षेत्र की जनता को भी इस चुनाव में जयराम व सुखराम दोनों में एक राम को चुनना है। चुनाव में इस बार राम नाम इतना बड़ा हो चुका है कि अन्य चुनावी मुद्दे गौण ही हो गए हैं। कांग्रेस जरूर रामस्वरूप से पांच वर्ष का हिसाब मांग रही है। भाजपा बेशक अपनी उपलब्धियां गिना भी रही है, लेकिन उसके बाद वोट अपने जिला के मुख्यमंत्री के नाम पर ही मांगे जा रहे हैं।

 

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