जलस्रोतों को बचाने का समय

बचन सिंह घटवाल

लेखक, कांगड़ा से हैं

जल समस्या से जूझता हुआ जनमानस अगर पानी का सही निर्धारण व उपयोग करे, तो समस्या से कुछ हद तक निपटा जा सकता है। पानी का यूं ही बहना, नालों को खुले छोड़ना व पानी का संग्रह न करना समस्या के मूल कारण बने हुए हैं। कभी-कभी विभागों की अनदेखी भी बहुतायत में पानी को बर्बाद होते देख कदम नहीं उठा पाते, कई स्थलों पर रिसते पानी की पाइपों का ध्यान न रखना या जनता द्वारा भी टूटी पाइप से बहते पानी की सूचना विभाग को न देना काफी पानी बेकार बहा देता है…

जल जीवन को संचारित करने वाला अनमोल तत्त्व है। प्रकृति की यह अनमोल देन धरा पर जीवन विकास की कहानी लिखती है। जीवन को अपनी अनमोल बूंदों से तृप्त करने वाला जल संसार चक्र का द्योतक है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह सर्वविदित है कि हमारी पृथ्वी का 71 प्रतिशत पानी है और पीने योग्य पानी की मात्रा बहुत सीमित है। आज संपूर्ण विश्व जल समस्या से जूझ रहा है और जहां तक भारत की बात है वर्ष भर कहीं न कहीं किसी राज्य में जल की किल्लत सहते हुए आमजन को देखा जा सकता है। गर्मियों का पदार्पण पानी की समस्या को और भी गंभीर कर देता है। हमारे देश में जहां पानी की अधिकता नजर आती है, वहीं व्यक्ति पानी को अनमने ढंग से बहाता चला जा रहा है। वह अनजान बना सा यही समझ रहा है कि प्रकृति किसी न किसी तरह जल उपलब्ध करवाती रहेगी। यूं तो बरसात का महीना हमारी नदियों की उफनती धारा हमें पानी से धनाढय बना देती है। वर्षा की आमद कई राज्यों को पानी से लबालब कर देती है। जब तक हम ठीक ढंग से पानी का संग्रह करना और उसका सही इस्तेमाल नहीं सीखेंगे तब तक उपलब्ध पानी को भी हम दूषित करते चले जाएंगे। आज जिन प्रदेशों में नदियों के प्रवाह हैं, वहां दूषित पानी की समस्या से हम जूझ रहे हैं। ऐसे में पानी होते हुए भी हम उसे ग्रहण करते हुए संकुचाते हैं। जहां पानी नहीं है वे बूंद-बूंद को तरसते दिखते हैं। हिमाचल की बात करें तो नदियों, झरनों से समृद्ध होते हुए भी हमारे बहुत से गांव, शहर पानी की समस्या को झेल रहे हैं। पिछले कुछ समय से राजधानी शिमला भी जल संकट से जूझ रही है। पर्यटक नगरी होते हुए जल संकट की समस्या देश-विदेश के सैलानियों पर प्रभाव डाल रही थी। यह हमारे लिए असमंजस का विषय था। इसी तरह हमारे हिमाचल में जहां उठाऊ पेयजल योजना का तानाबाना है जहां कहीं अपनी पहुंच से दूर है वहां तो समस्या है ही, परंतु प्रदेश में ग्रीष्म ऋतु में पेयजल योजनाओं का कभी कभार फेल हो जाना गंभीर पेयजल संकट पैदा कर देता है।

वर्तमान में प्रदेश जल समस्या से जूझता हुआ दिखाई दे रहा है। इसका मुख्य कारण यही समझ में आता है कि हम जल का उपयोग करते हुए इसके व्यर्थ बह जाने पर नियंत्रण नहीं कर पाते हैं। जहां पानी की उपलब्धता है भी तो वहां धीरे-धीरे कचरे और गंदगी के पसरते पैरों ने उन्हें दूषित कर दिया है, उस बहते जल की तरफ से ध्यान हटाकर हम आज उठाऊ पेयजल योजना द्वारा वितरित जल तक ही सीमित हो गए हैं। प्रदूषित हो रही खड्डों का जल होते हुए भी हम उनकी परवाह नहीं करते और इस्तेमाल करने में कतराते दिखते हैं। कहीं-कहीं यह समस्याएं मानव निर्मित ही हैं। खड्डों के किनारे व नदियों के प्रवाह में गंदगी डालना, जल को अनुपयोगी बना देता है। कहीं-कहीं मवेशियों के मृत शरीर नदियों के इर्द-गिर्द दफनाने से व्यक्ति उस निर्मल धारा को मुंह में डालने से अच्छा नालों द्वारा वितरित जल तक सीमित हो गया है। हमारे देश में करीब 50 लाख झरने और जल स्रोत हैं, जिनमें अकेले 30 लाख के करीब हिमालय क्षेत्र में हैं। बावजूद इसके इनमें से ज्यादातर झरने और जलस्रोत पानी की बढ़ती मांग, जमीन का गलत इस्तेमाल और पर्यावरण के गिरते स्तर की वजह से सूख रहे हैं। प्रदेश में भी ऐसे झरनों और कुंओं का विस्तार दिखाई देता है, जिसमें बहुत से पेयजल योजनाओं व नलों से वितरित पानी पर पूर्णतः निर्भरता के कारण उनकी तरफ लोगों का ध्यान कम ही जाता है। अनदेखी के कारण या तो गांवों के बहुतायत कुंए व झरने सिमटने शुरू हो गए हैं या गंदगी के ढेरों की भेंट भी चढ़ते जा रहे हैं। जल समस्या से इनसान जूझता हुआ जल संरक्षण व वर्षा के पानी को संग्रह करने में भी बहुत पीछे है। वजह यही है कि किसी न किसी तरह जल का निर्वाह हो जाना या जीवन की अनथक दौड़ में इस तरफ ध्यानाकर्षण का समय ही व्यक्ति के पास नहीं रहा है। अनदेखी के कारण ही हमारे जलीय स्रोत सिमटने का दंश झेल रहे हैं।

जल समस्या से जूझता हुआ जनमानस अगर पानी का सही निर्धारण व उपयोग करे, तो समस्या से कुछ हद तक निपटा जा सकता है। पानी का यूं ही बहना, नालों को खुले छोड़ना व पानी का संग्रह न करना समस्या के मूल कारण बने हुए हैं। कभी-कभी विभागों की अनदेखी भी बहुतायत में पानी को बर्बाद होते देख कदम नहीं उठा पाते, कई स्थलों पर रिसते पानी की पाइपों का ध्यान न रखना या जनता द्वारा भी टूटी पाइप से रिसते बहते पानी की सूचना विभाग को न देना काफी पानी बेकार बहा देता है। इसमें मुख्यतः मैं जन चेतना की जागृति का ही आह्वान करूंगा कि पानी के उचित प्रयोग की तरफ अपना ध्यान केंद्रित करें, तो जितना जरूरी जल चाहिए उसे उपयोग करते हुए अतिरिक्त जल को यूं ही न बहने दें। पानी के स्रोतों की साफ-सफाई व कुओं की देखरेख की जिम्मेदारी निर्धारित की जाए तथा उपयोगी बावडि़यों और झरनों को दूषित होने से बचाएं। जब तक हम नदियों, झरनों को गंदगी मुक्त नहीं करते तब तक बहते जलीय स्रोत भी हमारे लिए उपयोगी साबित नहीं होंगे। जल समस्या से जूझता मानव जल के सही उपयोग की तरफ ध्यानाकर्षण करे तो जल भंडारण भविष्य की कई इबारतें लिखने के लिए हमारी भावी पीढ़ी को इस अमूल्य निधि से ओतप्रोत करता हुआ जल समस्या से अवश्य मुक्ति दिला सकता है बशर्ते पानी के संग्रह से हम धरती को पोषित करते रहें।

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