जिला के 331 नए फार्मर्स करेंगे प्राकृतिक खेती

शिमला—जिला कृषि प्रौद्योगिकी विभाग ने प्राकृतिक खेती के लिए 331 नए किसानों का चयन किया है। विभाग प्राकृतिक खेती करने वाले इन नए किसानों को जीरो बजट खेती के विशेष टिप्स दिलवाएगा। शिमला से यह फामर्स सोलन में राज्य स्तरीय प्रशिक्षण में जाएंगे। इस दौरान उन्हें पद्म श्री सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती के टिप्स देंगे। वहीं, प्रशिक्षण लेने के बाद ये फार्मर्स दूसरे किसानों को प्राकृतिक खेती को लेकर प्रशिक्षित करेंगे। बता दें कि शिमला जिला में पहले से ही लगभग 500 किसान प्राकृतिक  खेती के माध्यम से वेजिटेबल और सेब की अच्छी पैदावार कर रहे हैं। प्राकृतिक खेती से एक साल में फायदा ले रहे किसानों की अच्दी पैदावार को देखते हुए अन्य किसानों के भी आवदेन जिला कृषि विभाग में आए हैं। यही वजह है कि कृषि विभाग अब सभी किसानों को प्राकृतिक खेती के साथ जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। भले ही ट्रेनिंग के लिए विभाग ने 331 किसानों को ही सिलेक्ट किया हो, लेकिन कृषि विभाग का मानना है कि प्रशिक्षण लेने के बाद हर ब्लॉक में जाकर ये किसान जीरो बजट खेती के बारे में दूसरे लोगों को जागरूक करेंगे। जानकारी के अनुसार कृषि विभाग ने इस साल शिमला जिला के लगभग 3000 किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने का लक्ष्य तय किया है। हालांकि जानकारी के अनुसार जिला से प्राकृतिक खेती करने के लिए किसानों के कई आवेदन भी आ रहे हैं। इन सभी किसानों को प्राकृतिक रूप से सीजन लगाने व वेजिटेबल के लिए विभाग खुद भी हर ब्लॉक में जाकर प्रशिक्षण का आयोजन करेंगे। बता दें कि प्रदेश कृषि विभाग ने 50 हजार किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने का लक्ष्य रखा है। उसमें भी कृषि विभाग पहले कुछ किसानों को जीरो बजट खेती के टिप्स देंगे और फिर आगे जाकर वे दूसरे किसानों को इस बारे में बताएंगे। गौर हो कि शिमला जिला के किसानों के लिए यह अच्छी खबर है कि यहां पर वे सेब की खेती को भी आसानी से कर सकते हैं। अपर शिमला के सैकड़ांे बागबानों ने यह मिसाल कायम की है, जहां पर किसानों ने सेब के बागीचों में रासायनिक खाद छोड़कर गोबर व गौ मूत्र से तैयार खाद को अपनाया है। खास बात यह है कि शिमला जिला के ही फार्मर्स ने जीवामृत तक बनाने में कामयाबी हासिल की है। इस तरह से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पिछले साल 500 किसानों की प्राकृतिक खेती को देखकर दूसरे किसानों व बागबानों ने भी प्राकृतिक खेती का ही रास्ता अपना लिया है। कृषि विभाग का तर्क है कि अगर इसी तरह किसान व बागबान प्राकृतिक खेती को अपनाते रहे, तो इससे कैमिकल पदार्थों से बनने वाली खाद की मांग आने वाले समय में बिल्कुल कम हो जाएगी। वहीं गोबर व गौ मूत्र से तैयार होने वाली खाद व स्प्रे से सैकड़ों बीमारियों से भी छुटकारा मिलेगा। दरअसल कहा जाता है कि कैमिकल युक्त स्प्रे व अन्य दवाइयों के इस्तेमाल होने से लोगों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। अगर प्राकृतिक खेती को अपना लिया जाए तो हिमाचल में हजारों बीमारियों से भी पीछा छूटेगा। फिलहाल जिला कृषि विभाग ने किसानों के लिए ऑनलाइन प्राकृतिक खेती के साथ जोड़ने की सुविधा उपलब्ध करवाई है। ऐसे में यह देखना अहम होगा कि आने वाले समय में इसके क्या अच्छे परिणाम सामने आ पाते हैं। उल्लेखनीय है कि शिमला जिला में सबसे ज्यादा बागबानों का सेब सीजन महत्वपूर्ण होता है। प्राकृतिक खेती अपनाने वाले फार्मर्स को कृषि विभाग सबसे पहले थोड़े ही पौधों में प्राकृतिक खेती करने का प्रयास करेंगे। इस दौरान एक साल बाद यह आकलन किया जाएगा कि प्राकृतिक खेती से किसानों को ज्यादा फायदा हुआ भी या नहीं। यही फार्मूला जिला कृषि विभाग दूसरे वेजिटेबल उगाने वाले किसानों के साथ अपनाएंगे। अहम यह है कि प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों को विभाग के अधिकारी ऑनलाइन भी सुझाव देंगे।

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