जीवों का कल्याण

स्वामी विवेकानंद

गतांक से आगे…

उनके सामने एक नई मुसीबत आन खड़ी हुई। परीक्षा खत्म होते ही उनके पिता उनसे विवाह की जिद करने लगे। उन्होंने किसी संपन्न परिवार की कन्या से उनका विवाह तय कर दिया। लड़की थोड़ी सांवली थी,इसलिए उन्होंने दहेज में 20 हजार रुपए देने का वादा किया,सुनते ही नरेंद्र ने उनका विरोध किया।  उन्होंने दृढ़तापूर्वक स्पष्ट उत्तर दिया। मैं किसी भी हालत में शादी नहीं करूंगा। किसी की व्यक्तिगत स्वाधीनता में हस्तक्षेप करना विश्वनाथ बाबू की प्रकृति के विरुद्ध था। उन्होंने स्वयं तो पुत्र से अनुरोध नहीं किया, लेकिन दूसरे स्वजन के द्वारा नरेंद्र की सम्मति लेने का प्रयत्न किया। श्रीरामकृष्ण देव के गृही भक्तों में अत्यंत प्रसिद्ध भक्त डाक्टर रामचंद्र दत्त विश्वनाथ बाबू के घर में ही लालित पालित हुए थे। वो दूर के रिश्ते से इनके संबंधी थे। एक बार इन्होंने विवाह की आलोचना करते हुए उनके सामने यह बात रख दी, तब वे नरेंद्र की युक्तियों को सुनकर बोले, भाई अगर यथार्थ धर्म लाभ करना और सत्य की प्राप्ति ही तुम्हारा उद्देश्य है, तो ब्रह्मसमाज आदि स्थानों में न जाकर दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण देव के पास चले जाओ। सन् 1881 के दिसंबर के महीने में नरेंद्र ने दक्षिणेश्वर जाने की बात सोची। तब उनके पड़ौसी सुरेंद्र ने अपनी गाड़ी में उनको चलने के लिए कहा। नरेंद्र  अपने कुछ दोस्तों के साथ दक्षिणेश्वर पहुंच गए और गंगा की तरफ खुलने वाले दरवाजे से उन्होंने अपने साथियों के साथ ही रामकृष्ण के कक्ष में प्रवेश किया। उन्हें देखते ही श्रीरामकृष्ण ने फर्श पर बिछी चटाई पर बैठने को कहा। फिर उनके द्वारा गाने के लिए अनुरोध किए जाने पर नरेंद्र ने मन तथा प्राण उडे़लकर दो भक्ति गीत उन्हें सुनाए। नरेंद्र के इन गीतों से पूरा कमरा गूंज उठा। श्रीरामकृष्ण स्वयं को संभाल न सके, अहा!  अहा करते हुए समाधि मग्न हो गए। फिर कुछ सहज अवस्था में आने के बाद वो तन्मयता के साथ ईश्वरीय प्रसंग करने लगे। उन्हें फिर भाव समाधि हुई। नरेंद्र आश्चर्य से इस अनोखे व्यक्ति को देखते रहे। एक बार वो जैसे ही सहज अवस्था में आए, भाव विभोर हो वह नरेंद्र का हाथ पकड़कर एकांत में ले गए और खुश होते हुए उनसे कहने लगे, तू इतने दिनों तक मुझे भूलकर कैसे रहा? कब से तेरे आने की प्रतीक्षा कर रहा था। विषयी लोगों से बात करते-करते मेरा मुंह जल गया है। अब आज से तेरे समान सच्चे त्यागी के साथ बात करके मुझे शांति मिलेगी और यह कहते-कहते उनकी आंखों में आंसू उमड़ आए। नरेंद्र आश्चर्यचकित होकर उन्हें देख रहा थे। क्या कहें! उनकी समझ में नहीं आ रहा था। कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण हाथ जोड़कर सम्मान के साथ उन्हें संबोधित कर कहने लगे। मैं जानता हूं तुम सप्तर्षि मंडल के ऋषि हो, नर रूपी नारायण हो, जीवों के कल्याण की कामना से तुमने देह धारण की है।   

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