ट्रैफिक जाम में हिमाचल

कालका-शिमला मार्ग पर हर दिन का रिकार्ड ढोते वाहनों के लिए ट्रैफिक जाम का अर्थ केवल हिमाचल की लाचारी है। राजधानी शिमला को नापने के लिए यह जरूरी बन गया कि पर्यटक कुछ घंटे ट्रैफिक जाम में रहें। इसे हम प्रशासनिक अफरातफरी भी मान सकते हैं, जो पर्यटक सीजन को अपनी तरह से संबोधित करती है। प्रदेश के कमोबेश हर पर्यटक और धार्मिक स्थल तक पहुंचने की कसरतों में ट्रैफिक जाम पूरे हिमाचल की छवि को ध्वस्त करता है, लेकिन योजनाओं-परियोजनाओं के अभाव में यही हकीकत सामने रह जाती है। ट्रैफिक जाम के कई व्यावहारिक कारण हैं और जिन्हें बिना अधोसंरचना के भी काफी हद तक कम किया जा सकता है। सड़कों पर बेतरतीब पार्किंग, बसों के ठहराव तथा यातायात नियमों का उल्लंघन अगर रुक जाए, तो भी कुछ हद तक समाधान संभव है, वरना हर पर्यटक सीजन की समीक्षा पीड़ाजनक व लज्जाजनक तरीके से होती रहेगी। इसी साल की शुरुआत अगर कालका-शिमला मार्ग को ट्रैफिक जाम के कटु अनुभव से जोड़ रही है, तो विकल्प की शून्यता प्रदेश को असहाय बना देती है। आखिर कितने सालों बाद प्रदेश की सड़कों की क्षमता और परिवहन बंदोबस्त इतने पुख्ता होंगे कि सैलानी बिना समय गंवाएं सैर सपाटा कर ले। हिमाचल में सप्ताहांत पर्यटन ने जिस तरह रफ्तार पकड़ी है, उससे इन दिनों डलहौजी, मकलोडगंज, कसौली, शिमला तथा मनाली आने वाले पर्यटक केवल अफरातफरी के बीच मनोरंजन ढूंढ रहे होते हैं। मंदिरों की व्यवस्था भी ट्रैफिक जाम की तरह दर्शनार्थियों के लिए एक सख्त कसौटी है। श्रद्धालुओं की तादाद में मंदिर परिसर में बढ़ती भीड़ का प्रबंधन तथा आस्था के प्रतीकों की पवित्रता को कायम रखने का अनुशासन तय करना होगा, वरना सड़क पर खड़ी गाडि़यां और मंदिरों की तैयारियां एक जैसी लचर व्यवस्था में दिखाई देंगी। इस तरह के अनुभव की शिकायत रविवार के दिन चामुंडा मंदिर परिसर से मिली, जहां पर्यटकों ने असंतोष प्रकट किया है कि उनके लिए दर्शन करना भी न सही और न ही सुविधाजनक रहा। मंदिर बंदोबस्त में कानून-व्यवस्था की अवहेलना तथा पूजा-अर्चना में श्रद्धालुओं  के साथ दुर्व्यवहार की शिकायतों का समाधान नहीं होगा, तो अराधना में पनपे जोश के सिलसिले केवल भीड़ को देखने जैसा ही होगा। भीड़ में पर्यटन अगर ट्रैफिक जाम या अफरातफरी के माहौल में फंसा है, तो यह प्रदेश की बदनामी कहीं अधिक है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि न तो कश्मीर सदा अशांत रहकर हमारी पर्यटन क्षमता बढ़ाता रहेगा और न ही कटु अनुभव हिमाचल का सही प्रचार करता रहेगा। इस बीच मुख्यमंत्री के अतिरिक्त प्रधान सचिव संजय कुंडू का परिवहन के विकल्पों पर किया गया विदेश दौरा इस दिशा में कारगर सिद्ध हो सकता है, बशर्ते धरातल पर परियोजनाएं आकार लें। अतिरिक्त प्रधान सचिव की रिपोर्ट व विदेशी निवेश की संभावनाओं से रज्जु मार्ग व एलिवेटिड परिवहन व्यवस्था की दिशा में हिमाचल बढ़ पाया, तो कम से कम पर्यटक शहरों को वाहनों की आफत से बचाया जा सकता है। परिवहन, पर्यटन तथा सड़क अधोसंरचना के क्षेत्र में सामंजस्य बिठाने के साथ-साथ नए विकल्पों पर  तीव्रगामी ढंग से नवाचार व तकनीक को प्रश्रय देना होगा, ताकि सैलानियों की अनुभूति यहां से सार्थक बनकर वापस लौटे।

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