तंत्र साधना का इतिहास बहुत प्राचीन है

तंत्र साधना का इतिहास बहुत प्राचीन है। वैदिक काल से भी पहले जो आदिम जातियां इस भूभाग पर रहती थीं, उनमें लिंग और योनि की पूजा प्रचलित थी। जब उन लोगों ने देखा कि मनुष्यों के प्रजनन में इन इंद्रियों का प्रमुख हाथ है, तो वे इनकी प्रतीकात्मक रूप से पूजा करने लगे। जिस प्रकार आर्यों द्वारा सूर्य, चंद्र, अग्नि, वायु, तेज एवं वर्षा आदि के देवताओं की पूजा होती थी, उसी प्रकार आर्येतर जातियों में लिंग पूजा का प्रचलन था। जब आर्यों का संपर्क इन अनार्य जातियों से हुआ तो उन्होंने इस प्रचलित लिंग एवं योनि पूजा को अपने धर्म ग्रंथों में शिव और शक्ति की पूजा के रूप में सम्मिलित कर लिया। कालांतर में शिव और शक्ति पूजन का विकास होते-होते शैव तथा शाक्त संप्रदायों का गठन हुआ। बाद में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रसार हुआ और उस समय के बहुत से शैव तथा शाक्त मतावलंबी भी इस धर्म में दीक्षित हो गए…

-गतांक से आगे…

तंत्र और कुंडलिनी

तंत्र साधना का इतिहास बहुत प्राचीन है। वैदिक काल से भी पहले जो आदिम जातियां इस भूभाग पर रहती थीं, उनमें लिंग और योनि की पूजा प्रचलित थी। जब उन लोगों ने देखा कि मनुष्यों के प्रजनन में इन इंद्रियों का प्रमुख हाथ है, तो वे इनकी प्रतीकात्मक रूप से पूजा करने लगे। जिस प्रकार आर्यों द्वारा सूर्य, चंद्र, अग्नि, वायु, तेज एवं वर्षा आदि के देवताओं की पूजा होती थी, उसी प्रकार आर्येतर जातियों में लिंग पूजा का प्रचलन था। जब आर्यों का संपर्क इन अनार्य जातियों से हुआ तो उन्होंने इस प्रचलित लिंग एवं योनि पूजा को अपने धर्म ग्रंथों में शिव और शक्ति की पूजा के रूप में सम्मिलित कर लिया। कालांतर में शिव और शक्ति पूजन का विकास होते-होते शैव तथा शाक्त संप्रदायों का गठन हुआ। बाद में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रसार हुआ और उस समय के बहुत से शैव तथा शाक्त मतावलंबी भी इस धर्म में दीक्षित हो गए। तत्पश्चात उन लोगों ने बौद्ध धर्म में अपनी पूजा पद्धतियों का प्रवेश करा दिया। बौद्ध धर्म कई शाखाओं-प्रशाखाओं में विभक्त हो गया और उनकी वह शाखा जो तांत्रिक पूजा-अनुष्ठानों में विश्वास रखती थी, वज्रयान कहलाई। मुसलमानों के राज्यकाल में हिंदू मंदिरों, मठों तथा बौद्ध विहारों पर बहुत अत्याचार हुए और उनके प्रसिद्ध मठ-विहार आदि भूमिसात कर दिए गए। ऐसे में वे लोग अपने प्राण बचाने के लिए इधर-उधर भाग गए। उनकी बहुत बड़ी संख्या नेपाल, चीन तथा तिब्बत की ओर चली गई। बिहार तथा आसाम के क्षेत्रों में भी बहुत से लोग भूमिगत हो गए। इसी के साथ तंत्र साधना भी लुप्तप्राय होती गई। जो लोग वास्तव में तंत्रवेत्ता हैं, वे बहुत कम रह गए हैं। लेकिन तिब्बत के मठों में आज भी उत्तम तांत्रिक देखने को मिलते हैं। तंत्र साधना अति गोपनीय तथा दुष्कर है। यह मूलतः कुंडलिनी योग पर आधारित है। तंत्र और योग परस्पर मिले हुए हैं। ये प्रयोगात्मक वैज्ञानिक विषय हैं। जितनी शक्तियां ब्रह्मांड में हैं, वे सब मनुष्य के पिंड शरीर में भी हैं।

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