तेल पर भारत-चीन रणनीति

डा. जयंतीलाल भंडारी

विख्यात अर्थशास्त्री

उल्लेखनीय है कि ईरान से कच्चा तेल लेना भारत के लिए फायदेमंद होता है। ऐसे में भारत को उपयुक्त दरों पर कच्चे तेल की आपूर्ति के लिए नए बाजार देखने होंगे। इस परिप्रेक्ष्य में रूस, मेक्सिको, अरब अमीरात, कुवैत और सऊदी अरब से अधिक कच्चा तेल आयात करने के विकल्पों पर ध्यान देना होगा। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद ने कोयले को तरल स्वरूप में विकसित करके उससे पेट्रोल-डीजल तैयार करने की जो नई तकनीक विकसित की है, उसे अब उद्योग जगत को हस्तांतरित किया जाना चाहिए, ताकि बड़े पैमाने पर कोयले का इस्तेमाल पेट्रोलियम उत्पादन में किया जा सके। देश में 302 अरब टन से भी ज्यादा कोयले के भंडार हैं। सरकार द्वारा बिजली से चलने वाले वाहनों पर भी काफी जोर देना होगा…

2 मई से भारत सहित आठ देशों को ईरान से कच्चा तेल (क्रूड ऑयल) आयात करने की अमरीका द्वारा दी गई छूट खत्म हो गई है। अब यदि तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक और रूस जैस देश कच्चे तेल की आपूर्ति नहीं बढ़ाते हैं, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी दिखाई देगी। इससे भारत ही नहीं, वैश्विक अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा। ऐसे में पूरी दुनिया कच्चे तेल को लेकर भारत और चीन द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की जा रही नई रणनीति के तहत उपयुक्त कीमतों पर कच्चे तेल की उभरती हुई संभावनाओं को देख रही है। अप्रैल 2019 के अंतिम सप्ताह में चीन के नेशनल एनर्जी एडमिनिस्ट्रेशन के उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने भारत आकर कच्चे तेल की कीमत को लेकर तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक की मनमानी पर लगाम लगाने की द्विपक्षीय भारत-चीन वार्ता को अंतिम  दौर में पहुंचाया है। यह वार्ता पिछले वर्ष अप्रैल 2018 में नई दिल्ली में आयोजित इंटरनेशनल एनर्जी फोरम की 16वीं मंत्रिस्तरीय बैठक के बाद लगातार सफलतापूर्वक आगे बढ़ती रही है।

ऐसे में दुनिया के अर्थविशेषज्ञों का मानना है कि अब चीन और भारत तेल की कीमतों को लेकर अपनी नई साझेदारी के कारण कच्चे तेल के खरीदारों का एक समूह (ब्लॉक) बना सकते हैं। इससे वे तेल उत्पादक देशों से मोलभाव करके तेल की कीमत कुछ कम कराने में अवश्य सफल हो सकते हैं। चीन और भारत द्वारा सबसे पहले एशियाई तेल उत्पादक देशों  द्वारा कच्चे तेल की बिक्री पर जो एशियाई प्रीमियम ली जाती है, उसे समाप्त कराने के लिए जोरदार आवाज आगे बढ़ेगी। ज्ञातव्य है कि एशियाई देशों के लिए तेल आपूर्तियां दुबई या ओमान के कच्चे तेल बाजारों से संबंधित होती हैं, परिणामस्वरूप कच्चे तेल की कीमतें अपेक्षाकृत अधिक ली जाती हैं। कच्चे तेल की खरीदी में यूरोप व उत्तरी अमरीका के देशों की तुलना में एशियाई देशों को कुछ अधिक कीमत चुकानी पड़ती है, जिसे एशियाई प्रीमियम नाम दिया गया है। एशियाई प्रीमियम अमरीका या यूरोपीय देशों की तुलना में प्रति बैरल करीब छह डालर अधिक है।

गौरतलब है कि चीन और भारत दुनिया में बड़े तेल आयातक देश हैं। चीन द्वारा किया जाने वाला कच्चे तेल का सालाना उपभोग करीब 12 मिलियन बैरल है और कुल वैश्विक खपत में उसकी हिस्सेदारी 13 फीसदी है, जबकि भारत द्वारा कच्चे तेल का सालाना उपभोग करीब 4 मिलियन बैरल है, जो कुल वैश्विक खपत का करीब 4 फीसदी है। इस तरह वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल का 17 फीसदी उपभोग करने वाले चीन और भारत नई रणनीति के माध्यम से तेल उत्पादक देशों से यह कहते हुए दिखाई दे रहे हैं कि वे तेल के सबसे बड़े क्रेता हैं। अतएव उनसे कोई एशियाई प्रीमियम वसूल करने की बजाय उन्हें बड़ी मात्रा में तेल खरीदी का विशेष डिस्काउंट दिया जाए। निस्संदेह चीन के नेशनल एनर्जी एडमिनिस्ट्रेशन के साथ नई दिल्ली में भारत के उच्च अधिकारियों की बैठक के बाद चीन और भारत द्वारा कच्चे तेल की कीमत कम करवाने के लिए बनाई गई नई रणनीति भारत और चीन सहित वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अत्यधिक लाभप्रद होगी। हाल ही में 29 अप्रैल को विश्व विख्यात आर्थिक-वित्तीय शोध संगठन ऑक्सफोर्ड इकोनामिक्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि अमरीका द्वारा ईरान से कच्चे तेल की आपूर्ति पर प्रतिबंध, तेल उत्पादक देशों के संगठन और सऊदी अरब द्वारा कच्चे तेल का उत्पादन न बढ़ाने के निर्णय से वर्ष 2019 के अंत तक कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 100 अरब डालर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। चूंकि भारत अपनी जरूरत का करीब 80 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है तथा भारत अपनी जरूरत का 10 फीसदी कच्चा तेल ईरान से आयात करता है, अतएव कच्चे तेल की कीमतों के मामले में भारत की मुश्किलें  बढ़ती हुई दिखाई दे रही हैं।

यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि ईरान से भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति तुलनात्मक रूप से कम कीमत पर और अधिक रियायतों के साथ होती रही है। ऐसी आपूर्ति बंद होने से भारत का तेल आयात महंगा होगा। इससे चालू वित्त वर्ष 2019-20 में भारत का व्यापार घाटा बढ़ेगा। रुपया कमजोर होगा, साथ ही विकास दर पर भी असर पड़ेगा। पिछले वित्त वर्ष 2018-19 में भारत का तेल आयात बिल 125 अरब डालर का था, जो वर्ष 2017-18 के मुकाबले 42 फीसदी ज्यादा था। एक अनुमान के अनुसार यदि कच्चे तेल के भावों में एक डालर प्रति बैरल की बढ़ोतरी होती है, तो भारत को करीब 10700 करोड़ रुपए की हानि होती है अर्थात खरीदी के लिए इतनी धनराशि अधिक चुकानी होगी। उल्लेखनीय है कि ईरान से कच्चा तेल लेना भारत के लिए फायदेमंद होता है। ऐसे में भारत को उपयुक्त दरों पर कच्चे तेल की आपूर्ति के लिए नए बाजार देखने होंगे। इस परिप्रेक्ष्य में रूस, मेक्सिको, अरब अमीरात, कुवैत और सऊदी अरब से अधिक कच्चा तेल आयात करने के विकल्पों पर ध्यान देना होगा। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद ने कोयले को तरल स्वरूप में विकसित करके उससे पेट्रोल-डीजल तैयार करने की जो नई तकनीक विकसित की है, उसे अब उद्योग जगत को हस्तांतरित किया जाना चाहिए, ताकि बड़े पैमाने पर कोयले का इस्तेमाल पेट्रोलियम उत्पादन में किया जा सके। देश में 302 अरब टन से भी ज्यादा कोयले के भंडार हैं। सरकार द्वारा बिजली से चलने वाले वाहनों पर भी काफी जोर देना होगा।

जैव ईंधन और सार्वजनिक परिवहन के अधिक उपयोग को प्राथमिकता दी जानी होगी। साथ ही चीन और भारत ने पश्चिमी एशियाई देशों से वाजिब दाम पर कच्चा तेल आयात करने की जिस संयुक्त रणनीति को अप्रैल 2019 के अंतिम सप्ताह में अंतिम रूप दिया है, उसे शीघ्रतापूर्वक पूर्णरूपेण घोषित करके उसके कारगर प्रभाव के लिए तेल उत्पादक देशों पर जोरदार दबाव बनाया जाना होगा। हम आशा करें कि लोकसभा चुनाव के उपरांत गठित होने वाली नई सरकार देश की अर्थव्यवस्था को कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के खतरे से बचाने, विकास की डगर पर आगे बढ़ाने और आम आदमी को महंगे ईंधन की पीड़ाओं से बचाने के लिए कारगर रणनीतिक कदम आगे बढ़ाएगी।

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