दिग्गजों की पीठ लगा चुकी है मंडी सीट

वीरभद्र सिंह, पंडित सुखराम, महेश्वर, कौल ठाकुर व प्रतिभा जैसे धाकड़ नेता हार चुके हैं चुनाव, 2014  चुनाव में सबसे बड़ा उलटफेर

मंडी – चुनाव में किसकी जीत और किसकी हार होगी, यह तो जनता ही तय करती है, लेकिन मंडी संसदीय क्षेत्र की जनता हार-जीत ही नहीं, बल्कि कई बार बड़ा उलटफेर कर चुकी है।  इस सीट के मतदाता बडे़-बडे़ नेताओं और उनके अति विश्वास को धूल चटा चुके हैं। मंडी संसदीय सीट पर एक नहीं अब तक कई दिग्गज नेताओं को भी हार का मुंह देखना पड़ा है, जिनके कभी न हारने के दावे किए जाते थे, लेकिन उन्हें मंडी की जनता ने ऐतिहासिक हार तक पहुंचा दिया। इस सीट पर जहां दिग्गज नेता हारे हैं, तो कई बार नए चेहरों में आम कार्यकर्ताओं ने जीत का सेहरा भी इसी सीट से अपने सिर बांधा है। मंडी संसदीय क्षेत्र में अब तक सबसे बड़ा उलटफेर 2014 के लोकसभा चुनावों में पूरा देश देख चुका है। पिछले चुनाव भाजपा के नए चेहरे और जीवन का पहला चुनाव लड़ रहे रामस्वरूप शर्मा ने उस समय की वर्तमान सांसद व तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की धर्मपत्नी प्रतिभा को हरा दिया था। इसी तरह से 1977 में यहां से जनता लहर में वीरभद्र सिंह को ठाकुर गंगा सिंह के हाथों हार का मुंह देखना पड़ा था, तो वहीं 1989 में पंडित सुखराम को मंत्री रहते हुए भी पहली बार लोकसभा के मैदान में उतरे महेश्वर सिंह ने धूल चटा दी थी। कुल्लू के महेश्वर सिंह भी सुखराम व प्रतिभा सिंह से इस सीट पर हार चुके हैं। कांग्रेस के दिग्गज नेता ठाकुर कौल सिंह जो अपने दं्रग विधानसभा क्षेत्र से आठ बार विधायक चुने जा चुके हैं, वह भी एक बार इस सीट से लोकसभा का चुनाव हार चुके हैं। प्रतिभा सिंह को एक बार महेश्वर सिंह ने हराया था तो 2104 में तो वीरभद्र सिंह के मुख्यमंत्री रहते हुए भी उनकी मंडी सीट से हार हुई थी।  इसी सीट पर 1984 में कर्मचारी नेता मधुकर, जिन्हें अब तक सबसे सशक्त प्रदेश प्रधान माना जाता था, को भी पंडित सुखराम से हार मिली थी। इसी तरह 1996 में यहां से कर्मचारी नेता व प्रदेशाध्यक्ष अदन सिंह ठाकुर की भी बुरी तरह से पीठ लग गई थी।

संसदीय क्षेत्र से खुद जयराम ठाकुर भी हार चुके हैं उपचुनाव

इसी सीट पर जून, 2013 में हुए उपचुनाव में प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री व उस समय सराज के विधायक जयराम ठाकुर को भी हार का सामना करना पड़ा। उस समय जयराम का मुकाबला प्रतिभा सिंह से हुआ था और प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में थी। ऐसे माहौल में जयराम मंडी के बडे़ नेता होने के बाद भी चुनाव हार गए थे।

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