नारा लगाएं, कुर्सी पाएं

रामविलास जांगिड़

स्वतंत्र लेखक

जनता बहकावे में जी रही है। भुलावे में है कि नारों से पेट नहीं भरता। चुनावी वर्ष में नारे दीवार चढ़कर बोल रहे हैं या तो नारे माइक तोड़कर उछल रहे हैं। हर नेता अपने कंधे पर नारों की पोटली लादे घूम रहा है। माइक दर माइक व सभा दर सभा। जनता काम मांग रही है, स्कूल मांग रही है, सामाजिक न्याय मांग रही है और नेता नारे उछाल रहा है। काम के बदले नारा योजना। नेता वही, जो नारे मारे। जनता कहती है नारों से पेट नहीं भरता, किंतु जनता भुलावे में जी रही है। नारों से पेट ही क्या, पूरा का पूरा घर-परिवार सब भर सकता है। पिछले चुनावों में नाथमला ने नारा दिया ‘गरीबी हटाएंगे, मुझे वोट दीजिए’। जनता ने नाथमला को वोट दिया। नाथमला के नारे ने चमत्कार किया। नाथमला जी सालभर में ही गरीबी से दूर हट गए। उन्होंने अमरीका में अपनी पांचवीं फैक्टरी का भूमि पूजन करवा दिया। उनकी गरीबी तुरंत हट गई, साथ ही वह स्वयं गरीबों से भी दूर हट गए। मूर्ख लोग हैं, जो कहते हैं कि नारों से पेट नहीं भरता। नारे ने अगले का पूरा का पूरा घर ही भर दिया। कहां तक गिनाएं, इन नारों की महत्ता। नारे अनंत नारे, कथा अनंता! इसलिए अब यह कहना मूर्खता होगी कि नारों से पेट नहीं भरता। नारों से घर, कोठी, हवेली, सब भरता है। अतः नारों की महत्ता के लिए यह नारा सत्य होगा कि ‘जिसने दिया है नारा, वह कभी न हारा’। इसलिए काम करने की बेवकूफी थूक डालिए, जल्दी से कोई नारा उछालिए।  उठिए काम करने-कराने की सड़ी मानसिकता को त्याग दीजिए। सिर्फ नारा दीजिए! वह देखिए आपके सामने एक वरिष्ठ नारा अधिकारी आ रहा है। वह चुनाव जीतने की कलाकारी में ‘हर हाथ को काम’ का नारा हवा में लहरा रहा है। आप नारे का विरोध मत कीजिए। बस आप भी उसके हर हाथ में शामिल हो जाइए, क्योंकि उसके हर हाथ का मतलब उसके भाई, भतीजे, चमचे, उपचमचे आदि सज्जनों के हाथ भी सम्मिलित हैं। अतः आप भी उनके हर हाथ का हिस्सा बन जाइए। नारों की बरसात का हिस्सा बनिए, फिर देखिए, नारा किस कद्र आपका घर भर देता है। सच्चा विकास तो सिर्फ नारों से ही संभव है। नारा लगाएं, डालर कमाएं। नारा लगाएं, कुर्सी पाएं। अगर आपको देश पर राज ही करना है, तो फिर अच्छा सा कोई नारा लगाएं। नारा है, तो जीवन है। एक नारा तबीयत से तो उछालो यारो, कौन कहता है अमरीका में बंगला नहीं बनता।

You might also like