निशाने पर विपक्षी सरकारें

चुनाव नतीजों की गाज किसी पर गिरे या न गिरे, लेकिन विपक्ष की कुछ सरकारों पर भाजपा की टेढ़ी निगाहें जरूर हैं। इनमें से मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार तुरंत संकट की स्थिति में है। भाजपा ने उसके बहुमत को चुनौती दी है, बल्कि सरकार के अल्पमत में होने का दावा करते हुए राज्यपाल आनंदीबेन पटेल को पत्र लिखा है कि विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया जाए, ताकि सरकार अपना बहुमत साबित कर सके। सरकार करीब छह माह पुरानी है। दरअसल मध्य प्रदेश में जनादेश ही कांग्रेस के पक्ष में नहीं था। भाजपा को सर्वाधिक 42 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस के पक्ष में करीब 41 फीसदी मतदान हुआ था, लेकिन नतीजा हैरान करने वाला था कि 230 के सदन में 114 विधायक कांग्रेस के और 109 विधायक भाजपा के चुनकर आए। यानी जनादेश त्रिशंकु रहा। चूंकि बसपा के दो, सपा के एक और निर्दलीय चार विधायकों ने कांग्रेस को समर्थन दिया, लिहाजा कांग्रेस सरकार बनी, लेकिन कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद सरकार ने सदन में बहुमत साबित नहीं किया। अब देश में आम चुनाव के नतीजों की तारीख 23 मई, से पहले ही नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने राज्यपाल को पत्र लिखकर विशेष सत्र बुलाने की मांग की है, राजनीतिक सत्य यही नहीं है। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान तुगलक रोड घोटाले और फर्जी कर्जमाफी का उल्लेख कई बार किया था। संदर्भ आयकर छापों का था, जिनमें करोड़ों की नकदी बरामद की गई थी। छापे मुख्यमंत्री कमलनाथ के करीबी सहयोगियों के आवास और अन्य ठिकानों पर मारे गए थे। प्रधानमंत्री ने उसे भ्रष्टाचार और अवैध वसूली के मामले माना था। आयकर विभाग ने भी अपना विश्लेषण पूरा कर लिया होगा! अब स्पष्ट संकेत हैं कि यदि केंद्र में दोबारा मोदी सरकार की वापसी हुई, तो नकदी के उस प्रकरण को खोला जाएगा। प्रधानमंत्री के अलावा, मध्य प्रदेश के वरिष्ठ भाजपा नेता एवं राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने भी राज्य सरकार की जिंदगी 20-22 दिनों की मानी है। हालांकि 13 लंबे सालों तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट किया है कि हम अपनी ओर से सरकार गिराने का प्रयास नहीं करेंगे। बहरहाल कमलनाथ सरकार ‘स्वाभाविक जनादेश’ वाली नहीं है, तो सदन में बहुमत साबित करने के दौरान आंकड़े कुछ भी बयां कर सकते हैं। कांग्रेस अंदरूनी कलह और विरोधाभासों की शिकार भी है। उसके अलावा, बसपा-सपा विधायकों के समर्थन वापस लेने पर सत्ता का संतुलन बिगड़ भी सकता है। दरअसल भाजपा मध्य प्रदेश को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती, लिहाजा वापस कब्जाने की चाहत भी राजनीति करवा रही है। मध्य प्रदेश के अलावा, राजस्थान, कर्नाटक और बंगाल की राज्य सरकारें भी निशाने पर हैं। चुनाव के दौरान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का प्रधानमंत्री के प्रति ‘गालीनुमा व्यवहार’ भी मोदी और भाजपा भूले नहीं होंगे। अभिप्राय यह नहीं है कि मोदी सरकार भी कांग्रेस की पूर्ववर्ती केंद्र सरकारों की तरह अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग शुरू कर सकती है, लेकिन भाजपा अपनी राजनीतिक जमीन को और अधिक पुख्ता करने के प्रयास कर सकती है। बंगाल में 2021 में ही विधानसभा चुनाव हैं और भाजपा वहां दूसरे नंबर की पार्टी बन ही गई है। राजस्थान और कर्नाटक ऐसे राज्य हैं, जहां कांग्रेस की लटकी हुई सरकारें हैं। राजस्थान में भी बहुमत बसपा विधायकों के भरोसे है। कर्नाटक में 38 विधायकों वाले जनता दल-एस की सरकार कांग्रेस के समर्थन से जारी है। कांग्रेस के 77 विधायक हैं, जबकि भाजपा 104 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है और बहुमत के भी करीब है। लिहाजा हररोज खबरें आती हैं कि इतने विधायक भाजपा नेता येदियुरप्पा के संपर्क में हैं। यदि मोदी 23 मई को दोबारा प्रधानमंत्री चुने गए, तो ‘आपरेशन लोटस’ कभी भी शुरू किया जा सकता है। दक्षिण भारत में पार्टी की पैठ और विस्तार बढ़ाने के मद्देनजर कर्नाटक सरकार बेहद महत्त्वपूर्ण है। वैसे भी लोकसभा चुनाव में भाजपा को बेहतर जनादेश कर्नाटक से मिलने के अनुमान भी हैं।

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