परीक्षा परिणामों से सबक लें

राकेश शर्मा

जसवां, कांगड़ा

हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड द्वारा पिछले कुछ समय में लिए गए ऐतिहासिक निर्णयों को देखकर ऐसा लगता है कि शिक्षा बोर्ड प्रदेश के सरकारी विद्यालयों में होने वाली परीक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से चाक-चौबंद और पारदर्शी बनाने की ठान चुका है। हालांकि इस कड़ी में बोर्ड द्वारा लिए जा रहे कुछ निर्णय विरोधाभासी भी साबित हो रहे हैं। सत्र 2018-19 की बोर्ड परीक्षाओं में बैठने वाले दसवीं और जमा दो के परीक्षार्थी किसी भी प्रकार से अनुचित साधनों का परीक्षा में प्रयोग न कर पाएं, इसके लिए प्रदेश शिक्षा बोर्ड ने दसवीं और जमा दो की बोर्ड परीक्षाओं को पूरे हिमाचल प्रदेश में सीसीटीवी कैमरों के अधीन करवाने का एक साहसिक और ऐतिहासिक निर्णय लिया था। सीसीटीवी कैमरों के अधीन हुई परीक्षाओं का असर परिणामों पर भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है। हाल ही में हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड द्वारा एक और ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है। यह बोर्ड परीक्षाओं में अनुत्तीर्ण छात्रों को फिर से जून महीने में दोबारा परीक्षा देने के लिए सहानुभूतिपूर्वक लिया गया निर्णय है। मार्च महीने में ली गई परीक्षा में फेल विद्यार्थी दो महीने के अंतराल के बाद फिर से उसी परीक्षा में बैठ सकेंगे, ताकि उनका साल खराब न हो। मार्च के आखिरी सप्ताह में वार्षिक परीक्षा से मुक्त होकर शायद ही कोई ऐसा विद्यार्थी हो, जिसने अपने खराब परीक्षा परिणाम का आकलन करके दोबारा परीक्षाओं की तैयारी में जुट गया हो। जिन विद्यार्थियों के परीक्षा परिणाम आशा के अनुरूप नहीं रहे हैं, उन्होंने अपने अध्यापकों के मार्गदर्शन में पूरा साल तैयारी की थी और फिर भी पास नहीं हो सके, जबकि बोर्ड ने कृपांक देकर भी पास करना चाहा था। अब बोर्ड द्वारा एक मौका दिए जाने पर वे किस प्रकार 20-25 दिनों में परीक्षा के लिए तैयार हो पाएंगे? यह निर्णय बोर्ड के पुराने निर्णयों के विरोधाभासी है। बोर्ड को इन परिणामों पर अडिग रहकर सहानुभूतिपूर्वक नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर निर्णय लेना चाहिए। खराब परीक्षा परिणामों को अच्छे परिणामों में बदलने की बजाय खराब परिणामों की जड़ को पकड़ना जरूरी है।

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