पर्यटकों के प्रति जिम्मेदारी

रोहतांग मार्ग के गुलाबा पर बरपा हंगामा, हमारी पर्यटन व्यवस्था का चेहरा बेनकाब करता है। हिमाचली सड़कों पर अगर सैलानियों को क्रोधित देखा जाए या वे असुविधाओं के लिए प्रदेश को कोस रहे हैं, तो यह तमाशा नहीं-तमाचा है। ऐसे अनेक परिदृश्यों से झांकता हिमाचली पर्यटन कालका-शिमला मार्ग के ट्रैफिक जाम में बदनाम हो रहा है, तो चामुंडा मंदिर की अव्यवस्था में निराश कर रहा है। गुलाबा में खेदजनक स्थिति में पहुंचे पर्यटक को अगर परिवहन व्यवस्था से शिकायत रही, तो ऑनलाइन परमिट की बिसात पर बैठा माफिया परेशान कर रहा है। यह एनजीटी की आंखों में धूल झोंकने की कवायद है या भ्रष्टाचार इस कद्र हावी है कि एक ही नंबर के दो-दो वाहन रोहतांग सैर के बहाने अमर्यादित आचरण निभा रहे हैं। क्या पर्यटन भी रोहतांग मार्ग पर जंगली हो रहा है या सैलानियों के प्रति हमारा व्यवहार केवल एक सीजन के जरिए ‘ग्राहक’ से अपनी शर्तों पर वसूली मात्र है। रोहतांग का अनुभव हो सकता है अलग तरह की व्यथा हो या एनजीटी के कड़े निर्देश अव्यावहारिक हों, लेकिन समूचे प्रदेश में पर्यटकों का आगमन कम से कम त्योहार की तरह तो नहीं। कितने पर्यटकों का हम अतिथि की तरह स्वागत कर रहे हैं। यह केवल पर्यटन विभाग की जिम्मेदारी नहीं और न ही इसे सशक्त करने का अब तक कोई प्रयास हुआ। अगर हम रोहतांग जैसी कुछ नई मंजिलें तय कर लें, तो भी नए क्षेत्रों में पर्यटक को भीड़ बनने से रोका जा सकता है, वरना हर साल की तरह वर्तमान दौर में पर्यटन केवल अफरातफरी को ही बढ़ावा दे रहा है। यह हमारे सामाजिक व सांस्कृतिक पहलू को भी नकारात्मक ढंग से पेश कर रहा है, तो राज्य के शिष्टाचार में क्या हम यह मंजूर कर लें कि पर्यटक सीजन को हालात पर छोड़ दें। पर्यटन की बढ़ती रौनक अंततः राज्य पर ही भारी पड़ रही है। नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं के अनुरूप अगर पर्यटन वृद्धि नहीं हैं, तो इसके निष्कर्ष को केवल चंद दिनों की आर्थिकी या व्यापारिक तरक्की में ही देखा जा सकता है। हमें क्या दिखाना चाहिए और कितना, इसको लेकर हिमाचल पर्यटन का रोड मैप है क्या। हम यात्रियों के किस वर्ग को पर्यटक मान रहे हैं और इनका मक्का है क्या। पर्यटकों की आमद बढ़ने का कारण हिमाचल की नीतियां हैं या व्यावसायिक प्रचार व सोशल मीडिया का दखल है। पर्यटन वृद्धि दर की व्यावसायिकता को समझना है, तो प्रदेश में निजी क्षेत्र के मार्फत नियमित रूप से दौड़ रही करीब पांच सौ डीलक्स या वोल्वो बसों के योगदान को समझना होगा। इसके अलावा पर्यटक वाहनों की शुमारी में दौड़ते मंजर को समझना होगा। क्या हिमाचल के परिवहन विभाग ने रोजाना पर्यटक को लाती और ले जाती टूरिस्ट बसों को लेकर नीति बनाई है या यह भी कि पर्यटक स्थलों पर वाहनों का संचालन कैसे होगा, इस पर कोई स्थायी पहल शुरू हुई। गुलाबा का अनुभव टैक्सी संचालन की अनियंत्रित व अमर्यादित व्यवहार की पेशकश है। विडंबना यह है कि टैक्सी व्यवसाय से सरकार की कर उगाही तो बढ़ रही है, लेकिन इनके संचालन की न तो कोई ठोस नीति और न ही इनकी किराया दरों में कोई पारदर्शिता आई है। हर छोटा-बड़ा पर्यटक केंद्र आतताई टैक्सी सेवाओं के आगे बौना दिखाई देता है। जब तक पर्यटकों के प्रति जिम्मेदार व्यवस्था कायम नहीं होगी, सीजन आएंगे और बरसाती बादलों की तरह लौट जाएंगे। हिमाचल में पर्यटन के स्थायित्व के लिए केवल अधोसंरचना विस्तार नहीं, बल्कि उनके प्रति शिष्टाचार और व्यावसायिक व्यवहार की शालीनता का प्रदर्शन जरूरी है। पर्यटक के लिए घूमना केवल रोमांच का अनुभव नहीं, बल्कि संस्कृति से रू-ब-रू होने का मकसद भी है। पिछले कुछ समय से खिल रहे पर्यटन सीजन की सौगात में हिमाचल की सांस्कृतिक रूह से मुलाकात का सैलानी को कितना अवसर मिला, इस पर सोचना होगा। अब तक तो सांस्कृतिक टोलियां, लोक गीत-संगीत, स्थानीय व्यंजनों पर आधारित फूड फेस्टिवल तथा मनोरंजन की महफिलें सक्रिय हो जानी चाहिए थीं। हिमाचल को पर्यटकों के प्रति जिम्मेदार व्यवस्था तथा आवभगत से मनोरंजन तक की पेशकश को मूलभूत सुविधाओं से सुसज्जित करना होगा, ताकि यहां आना सुखद अनुभव का पैकेज बने।

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