पर्यटन सीजन की प्रस्तुति

हिमाचल में पर्यटन सीजन के मायनों में लिपटी गतिविधियों ने विकास को हर बार अपने तरीके से परिभाषित किया। नतीजतन पर्यटक आगमन के आंकड़े तसदीक करते रहे कि यह राज्य कितना उपयुक्त और संभावनाओं से भरपूर है, फिर भी निगाहों और राहों में मतभेद रहा। यानी जो दिखाई दिया या संभव था, उसे पूरी तरह कबूल नहीं किया। आज भी अपनी आबादी से तीना गुना सैलानी बुलाकर हिमाचल पर्यटन राज्य नहीं बना, क्योंकि तारीफ और तासीर में फर्क है। कमोबेश हर पर्यटन सीजन एक जैसा ही दिखाई देता है, अलबत्ता भीड़, ट्रैफिक जाम और अफरातफरी का आलम बढ़ जाता है। ऐसे में पर्यटन जहां मुखातिब होता है, उस क्षेत्र की तरक्की में पैमाइश होना स्वाभाविक है। जिस तरह परिवहन क्षेत्र ने पर्यटन के सहारे स्वावलंबन को तरजीह देकर नए रोजगार को सुदृढ़ किया, उसी तरह हवाई यात्राएं भी उत्साहजनक संकेत दे रही हैं। हेलि टैक्सी से जुड़ते शिमला, कुल्लू व धर्मशाला से पर्यटन का एक नया सर्किट सक्रिय होगा और इसी संभावना में पर्यटन क्षमता में भी निखार आएगा। सवाल पर्यटक आगमन के आंकड़ों से नहीं, बल्कि सीजन में गोता खातीं सुविधाओं और प्रस्तुति का है। हर बार पर्यटन सीजन की प्रस्तुति अपने साथ नएपन के साथ ताजगी जोड़कर हो, तो हिमाचल को देखने का नजरिया बदलेगा। उदाहरण के लिए हिमाचल के कई सरकारी उपक्रम व विभाग सीधे पर्यटन सीजन के दौरान आर्थिकी का सीना चौड़ा कर सकते हैं, लेकिन ये संदर्भ पूरी तरह खाली रहे हैं। कहने को मिल्क फेडरेशन का हिसाब-किताब राजनीतिक ओहदेदारी का पोशाक पहन लेता है, लेकिन आज तक किसी ने उत्पादों की रौनक में सैलानियों के सामने प्रस्तुति देने की नहीं सोची। सारा पर्यटक सीजन गुजर जाएगा, लेकिन किसी को मिल्क फेडरेशन की प्रासंगिकता में इसके उत्पादों के दर्शन नहीं होंगे। कमोबेश इसी तरह बागबानी विभाग तथा निगम अपने सफर की कहानी में पर्यटन सीजन को हर साल प्रमुख पात्र बना सकता है। तीन-चार दशक पूर्व पर्यटन सीजन हिमाचल को फल राज्य के रूप में कबूल करता था, लेकिन आज के दौर में फलोत्पादन विपणन का सैलानियों के साथ कोई ताल्लुक ही नहीं रहा। इसे एचपीएमसी की काबिलीयत कहें या इस दस्तूर में यह भूल जाएं कि पर्यटन की वास्तविक क्षमता बढ़ेगी कैसे। हिमाचल को ऊर्जा राज्य बनाने के संकल्प तथा विद्युत परिषद का बढ़ता कर्ज अगर ऊर्जा पर्यटन को अहमियत दे, तो दिखाने को कई विद्युत परियोजनाएं तथा उनकी पृष्ठभूमि की रमणीयता लाभप्रद होने का विकल्प पैदा कर सकती हैं। बेशक वन विभाग ने कुछ रास्ते खोले, लेकिन ईको टूरिज्म की पहचान में हिमाचल की मंजिलें अभी भी सुस्त हैं। इसी तरह पीडब्ल्यूडी विभाग के मार्फत फूलदार पौधों से ब्लूमिंग हिमाचल की रौनक न जाने क्यों नदारद है। नौणी तथा पालमपुर विश्वविद्यालयों की सोहबत में किसान-बागबान की मेहनत पर विकसित होते एग्रो टूरिज्म की पहचान सांगला घाटी से आगे नहीं बढ़ी, तो योजना प्रारूप के नए कदमताल की आवश्यकता है। हिमाचल में पर्यटन की प्रस्तुति में स्थानीय निकायों की परिकल्पना अगर स्वच्छ भारत अभियान की सफलता ही जाहिर कर दे, तो यह प्रदेश अपनी नैसर्गिक खूबियां पेश कर सकता है। इसी तरह भाषा, कला-संस्कृति विभाग ने अपने मंच को पर्यटन सीजन के बीचोंबीच नहीं सजाया, तो सारे तामझाम की उपयोगिता कैसे महसूस होगी।

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