पूर्णमाशी को व्रत रखते हैं हिमाचली लोग

पूर्णमाशी का दिन, जिस दिन चंद्रमा पूर्ण रूपेण आकाश में दिखाई देता है, वह भी शुभ माना जाता है और इस दिन भी लोग उपवास रखने में पुण्य समझते हैं। अमावस्या का दिन भी शुभ माना जाता है। प्रत्येक त्योहार के समय विवाहित लड़कियोें को अपने घर बुलाना मां-बाप अपना कर्त्तव्य समझते हैं। हमारे मुख्य त्योहार कई हैं…

गतांक से आगे …

इसी प्रकार पूर्णमाशी का दिन, जिस दिन चंद्रमा पूर्ण रूपेण आकाश में दिखाई देता है वह भी शुभ माना जाता है और इस दिन भी लोग उपवास रखने में पुण्य समझते हैं। अमावस्या का दिन भी शुभ माना जाता है। प्रत्येक त्योहार के समय विवाहित लड़कियोें को अपने घर बुलाना मां-बाप अपना कर्त्तव्य समझते हैं। हमारे मुख्य त्योहार निम्न हैं, जो कि प्रदेश के कई भागों में मनाए जाते हैं।

चैत-संक्रांति :

 विक्रमी संवत् चैत मास की प्रथम तिथि (देशी महीनों की तिथि को स्थानीय बोली में प्रविष्टे कहा जाता है) से प्रारंभ होता है। चैत की संक्रांति भी त्योहार के रूप में मनाई जाती है, ताकि नया वर्ष शुभ और उल्लासमय हो। हालांकि इस दिन कोई विशेष पकवान वगैरह तैयार नहीं किए जाते अलबत्ता पूजा की जाती है।

निम्न भाग में देशी या मंगलमुखी और मध्य तथा ऊपरी भाग के ढाकी या तुरी जाति के लोग सारे चैत महीने में शहनाई और ढोलकी बजाते हुए घर-घर जाकर और मंदिरों के अहातों में नाच व गाकर मंगल गान करते हैं। लोग उन्हें अनाज, रुपए व कपड़े आदि देते हैं।

चतराली, चातरा या ढोलरू :

 कुल्लू में इस त्योहार को चतराली या चतरा कहते हैं और चंबा के भरमौर इलाके में इसे ढोलरू कहते हैं। चतराली से औरतें रात को इकट्ठा होकर नाच नाग करती हैं। ढोलरू में भी नृत्य का आयोजन किया जाता है।

छिंज:

चैत के महीने में निम्न भाग के क्षेत्रों में कुछ लोग अपनी इच्छा पूरी हो जाने पर या कुछ लोग सामूहिक तौर पर स्थानीय देवता जिसे लखदाता कहते हैं, को प्रसन्न करने के लिए छिंज का आयोजन करते हैं, जिसमें दूर-दूर से पहलवान बुलाए जाते हैं। इसका आयोजन आमतौर पर ऐसे स्थान पर किया जाता है जो समतल हो, परंतु आसपास से ऊंचा हो, ताकि ऊंचे स्थान से लोग कुश्तियां देख सकें। जहां कुश्तियां लड़ी जाती हैं वह जगह खोद कर नर्म कर दी जाती है। इसे ‘पिड़’ कहते हैं। पिड़ के चारों ओर दो या तीन आदमी चारों तरफ चलते-चलते ढोल को बजाते रहते हैं और ढोल की तान पर कुश्ती चलती रहती है। जीतने और हारने वाले दोनों पहलवानों को कुछ रुपए दिए जाते हैं। आखिरी कुश्ती जीतने वाले पहलवान को ‘माली’ दी जाती है। छिंजों में भी कुछ तो पारंपरिक रूप से कई सालों से मनाई जा रही है, लेकिन कुछ मन्नत पूरी होने के उपरांत किसी एक परिवार द्वारा आयोजन की जाती है।

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