पूर्ण सद्गुरु की कृपा

बाबा हरदेव

पारखीआ वथु समालि लइ गुर सोझी होई

नामु पर्दाथु अमुलू सा गुरमुखि पावै कोई।

अब ये बात ध्यान देने योग्य है कि जब कोई मनुष्य किसी चीज के बारे में ऊपर से ज्यादा जानता है, तो मनुष्य तो वही रह जाता है, इसका परिचय ज्ञान संग्रह बढ़ता चला जाता है, मगर ये खुद वहीं रह जाता है, इसमें रत्ती भर भी फर्क नहीं आता। मानो ऊपर-ऊपर से जानने का मतलब ऐसे ही है, जैसे कोई साधारण धनी आदमी अपनी तिजोरी में तो धन-दौलत बढ़ाता चला जाता है, पहले दस, फिर सौ, फिर हजार, फिर लाख, लेकिन ये मत ख्याल किया जाए कि जैसे- जैसे इस आदमी की तिजोरी में धन बढ़ेगा ये आदमी सही मायनों में ‘धनी’ हो जाएगा। अकसर देखने में आया है कि ऐसे आदमी जितने ऊपर से धनी मालूम होते हैं, ये अपने अंदर से गरीब हो जाते हैं। मानो ये तो केवल अपनी संग्रह की हुई दौलत पर ही पहरा देने वाले बन जाते हैं, केवल दौलत के चौकीदार, जबकि अगर कोई व्यक्ति गहराई से जानता है, तो इसके अंदर एक महाक्रांति घटित होती है। इसकी जीवन जीने की शैली बदल जाती है, क्योंकि गहरा जाने के लिए खुद गहरा होना पड़ता है, खुद को डुबोना पड़ता है, खुद को मिटाना अनिवार्य है। ये एक अटल सच्चाई है कि जब पूर्ण सद्गुरु की कृपा से जिज्ञासु को अपने अंदर ‘परम अज्ञानी’ होने का एहसास होना शुरू हो जाता है, तब इससे बड़ा जगत में कोई ब्रह्मज्ञानी नहीं होता। अतः पूर्ण सद्गुरु की कृपा से भक्त सच्चाई को अपनाने वाला, निर्मल स्वभाव वाला और बच्चों जैसा अज्ञानी हो जाता है। वही बच्चों जैसी सरलता इसके जीवन में आ जाती है। जैसे इसे कुछ पता ही नहीं। महात्माओं का ये सूत्र बड़ा ही प्यारा सूत्र हैः कितना मनुष्य ऊपर से जानता है, इसके ‘परम ज्ञान’ का कोई संबंध नहीं है, जबकि कितना मनुष्य ने खुद को बदला है, कितना इसके जीवन में परिवर्तन आया है, कितना ये अध्यात्म में डूबा है, कितना गहरा गया है, इससे इसके ‘परम ज्ञान’ का संबंध है। इस सूरत में इसका अहंकार विलीन हो जाता है। इसका मन अमन हो जाता है और जहां अहंकार विलीन होता है, वहां ‘परम ज्ञान’ में डुबकी लग जाती है। मानो अहंकार हमारा तैरना है, ऊपरी जानकारी है और जब अहंकार छूट जाता है, हाथ-पांव मारने बंद हो जाते हैं, फिर तैरना नहीं, ‘तरने’ की पद्धति प्रकट होती है। अब ये जो ‘परम ज्ञान’ है, ये आध्यात्मिक शांति का स्रोत है, रब्बी प्रकाश का स्रोत है, क्योंकि सद्गुरु भक्त को परम ज्ञान प्रदान करके इसकी सभी वासनाओं और महत्त्वाकांक्षाओं को खींचने की, इसके प्राणों की सारी बिखरी हुई विवेक रूपी किरणों को एक लपट बनाने और फिर इस लपट से प्रभु परमात्मा की यात्रा यानी परम सत्य की यात्रा पर ले जाने की पूर्ण क्षमता रखता है। अतः पूर्ण सद्गुरु की कृपा द्वारा ही ‘परिचय ज्ञान’ और ‘परम ज्ञान’ की वास्तविकता जानी जा सकती है और ‘परम ज्ञान’ के होते ही संसार नाम की कोई चीज नहीं रह जाती, क्योंकि परम ज्ञान का अभाव ही संसार है। मानो ‘अज्ञान से देखा गया परमात्मा भी संसार है और परम ज्ञान से देखा गया संसार है, परमात्मा।’

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