फील्ड में काम करें सचिवालय कर्मचारी

May 27th, 2019 12:15 am

यूनिफाइड काडर में डालने की मांग पर अड़ा महासंघ, फिर प्रदेश भर में कहीं भी हो सकेंगी बदलियां

शिमला —प्रदेश में सचिवालय कर्मचारियों का काडर बदलने की मांग उठने लगी है। सचिवालय के कर्मचारियों का अभी तक ऐसा काडर है कि वह यहां से कहीं दूसरी जगह तबदील नहीं हो सकते, लेकिन कर्मचारी राजनीति में अपना दखल पूरा रखते हैं। ऐसे में अब मांग उठने लगी है कि उनका भी यूनिफाइड काडर बनाया जाए, ताकि वे लोग भी फील्ड में काम करें। कर्मचारी महासंघ के संयोजक विनोद कुमार ने यह मांग उठा दी है जिनका कहना है कि सचिवालय के कर्मचारी भी जिलाधीश कार्यालयों में काम कर सकते हैं, जिन्हें वहां के लिए तबदील करने का प्रावधान हो। उनकी यह मांग सरकार द्वारा प्रशासनिक ट्रिब्यूनल को बंद किए जाने के प्रस्ताव पर सचिवालय कर्मचारियों द्वारा विरोध जताने पर उठी है। सचिवालय कर्मचारियों ने प्रशासनिक ट्रिब्यूनल को बंद किए जाने पर आंदोलन की धमकी दी है, जिस पर विनोद कुमार ने पलटवार किया है। उन्होंने इसे हस्यास्पद करार देते हुए कहा है कि सचिवालय कर्मचारी संघ के नेताओं का यह बयान प्रदेश भर में अपनी सेवाएं देने वाले कर्मचारियों की समस्याओं और उनके मुद्दों पर उनकी नासमझी को दर्शाता है। उन्होंने सचिवालय कर्मी संघ के नेताओं से यह पूछा है कि वह यह सार्वजनिक करें कि आज तक कर्मचारी समस्याओं और सरकार द्वारा राजनीतिक और बदले की भावना से प्रताडि़त कर्मियों की उन्होंने प्रशासनिक ट्रिब्यूनल और उच्च न्यायालय में कितने मामलों पर लड़ाई लड़ी है। सचिवालय कर्मी संघ नेताओं की ऐसी बयानबाजी से यह स्वयं स्पष्ट होता है कि प्रदेश के कर्मियों को समय पर न्याय न मिल सके और प्रदेश के विकास में अहम भूमिका निभाने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों पर इनका हमेशा दबदबा बना रहे। महासंघ का सचिवालय कर्मी नेताओं को यह प्रस्ताव है कि क्यों न सचिवालय कर्मचारियों के कैडर को भी ‘यूनिफाइड कैडर’ करने की मांग सरकार से की जाए, ताकि वे भी प्रदेश के अन्य कर्मचारियों की पीड़ा और उनकी मूलभूत समस्याओं की जानकारी हासिल कर सकें।

उद्देश्य पर खरा नहीं उतरा ट्रिब्यूनल

पूर्व के उदाहरण हैं कि जिस उद्देश्य से 1986 में प्रशासनिक ट्रिब्यूनल का गठन हुआ था, वह उस पर खरा नहीं उतर पाया और उसके बाद कर्मचारी संगठनों की तरफ से इसे बंद करने की मांग उठने लगी और पूर्व भाजपा सरकार ने ‘सेवाएं मामलों’ की पैरवी के लिए ट्रिब्यूनल को बंद कर उच्च न्यायालय में व्यवस्था दी, जिससे प्रदेश के कर्मचारियों को जहां कानूनन न्याय मिलना प्रारंभ हुआ, वहीं कर्मचारियों की राजनीतिक और बदले की भावना से प्रताड़ना पर भी काफी हद तक रोक लग चुकी थी, परंतु प्रदेश के कुछ राजनेताओं को यह सब रास नहीं आया और फिर राजनीतिक नजरिए से ट्रिब्यूनल को कांग्रेस सरकार ने पुनः चालू कर दिया, जिसके बाद भी मामले ज्यों के त्यों हैं।

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