बंगाल चुनाव हिंसा

पश्चिम बंगाल में हिंसक चुनावों की परंपरा रही है। वह विरासत मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी मिली है या उन्होंने उसे भी ग्रहण कर लिया है। इतना मानना ही पर्याप्त नहीं है, क्योंकि ममता की निर्मम सरकार के दौरान तमाम मर्यादाएं ‘बंगाल की खाड़ी’ में फेंक दी गई हैं। बेशक सरोकार और चिंताएं संविधान और लोकतंत्र को बचाने के प्रति जताई जाती रही हों, लेकिन लोकतंत्र के सबसे महान पर्व चुनाव को ही लहूलुहान किया जा रहा है। हत्याओं तक की कोशिशें की गई हैं। चेहरे कपड़े से ढंके हैं और हाथों में रिवॉल्वर हैं, यह कौन-सा लोकतंत्र है? ऐसे गुंडे-मवाली फिल्मों में ही दिखाई देते रहे हैं। असल जिंदगी में वे कहां से आ गए और वे किसके गुंडे हैं? एक भीड़ दूसरी भीड़ के पीछे भागती है। महिलाओं और पुरुषों में हाथापाई के दृश्य टीवी चैनलों पर देखे, तो आश्चर्य हुआ कि यह कौन-सा लोकतंत्र है? चुनाव आयोग ने छठे चरण की मात्र 8 सीटों पर सहज और शांति से मतदान के मद्देनजर केंद्रीय सुरक्षा बलों की 770 कंपनियां बंगाल में तैनात की थीं, फिर भी प्रत्येक बूथ को पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी जा सकी। व्यापक स्तर पर हजारों सुरक्षाकर्मियों की तैनाती के बावजूद हिंसा ऐसी हुई कि मीडिया भी उसका शिकार बना। इसे बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी करार दें या संघ-भाजपा की रणनीति मानें, लेकिन लोकतंत्र का सम्मान करना है, तो उसमें हिंसा की कोई गुंजाइश नहीं है। पहले वामपंथी हिंसा के जरिए चुनाव लूटते थे, लिहाजा वे 34 साल तक सत्ता में रहे। ममता बनर्जी ने उन्हें चुनौती दी, उनके काडर में सेंध लगाई, लेकिन हमारा मानना है कि ममता लोकतांत्रिक जनादेश के बाद ही सत्ता में आ पाई होंगी! फिर अब उनकी सरकार में मतदान के हरेक चरण में हिंसा के लावे क्यों फूटते नजर आ रहे हैं? चूंकि अब ममता के सामने प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा की चुनौती है, क्या उसी के मद्देनजर हिंसा का दामन थामा गया है? क्या हिंसा किसी चुनावी चुनौती या सत्ता-परिवर्तन को रोक सकती है? दरअसल जिन  आठ सीटों पर छठे चरण में मतदान हुआ है, उसमें से सात सीटें ऐसी हैं, जो भाजपा के ‘मिशन-23’ का हिस्सा हैं। अभी सभी आठ सीटें तृणमूल के कब्जे में हैं। क्या हिंसा के जरिए ममता और उनकी पार्टी अपनी सत्ता और सियासत बचा लेना चाहती हैं? बंगाल में संघ और भाजपा अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने को बीते कई सालों से सक्रिय रहे हैं। नतीजों के संकेत अब मिलने लगे हैं। 2014 के चुनाव में बंगाल में भाजपा को औसतन 17 फीसदी वोट हासिल हुए थे। पंचायत चुनावों में यह औसत बढ़कर करीब 19 फीसदी हो गया। कुछ सीटें तो ऐसी रहीं, जहां 40 फीसदी तक वोट भाजपा के पक्ष में आए। ये शुरुआती संकेत काफी सकारात्मक हैं। शायद यही कारण है कि उत्तर प्रदेश के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सबसे अधिक रैलियां बंगाल में ही संबोधित कीं। अब प्रधानमंत्री ने ‘चुपचाप कमल छाप’ अभियान का आह्वान किया है। दोनों पक्षों में चुनावी और व्यक्तिगत खटास इतनी बढ़ गई है कि ममता बनर्जी प्रधानमंत्री को थप्पड़ तक मारने को तैयार हैं और मोदी हर हालत में दीदी की सत्ता को उखाड़ने पर आमादा हैं। ममता चिंतित भी हैं, क्योंकि वामपंथियों का जो बचा-खुचा काडर था, वह भी भाजपा की तरफ जा रहा है। चुनावी हिंसा पर चुनाव आयोग को भी गंभीर निर्णय लेने पड़ेंगे। यदि एक पूर्व आईपीएस अधिकारी एवं अब भाजपा उम्मीदवार भारती घोष को अपनी जान बचाने के लिए मंदिर और थाने में शरण लेनी पड़ी, बावजूद सुरक्षाकर्मी के तो यह कैसा लोकतंत्र है? बहरहाल जो हालात कभी बिहार में सुना और देखा करते थे, उनसे भी उग्र और हिंसक माहौल अब बंगाल का हो गया है। उसके बावजूद ममता और विपक्षी खेमे की चीखा-चिल्ली है कि मोदी फिर प्रधानमंत्री बन गया, तो संविधान ही खत्म हो जाएगा और फिर कभी चुनाव नहीं कराए जाएंगे। यह बकवास प्रचार है, क्योंकि भारत का लोकतंत्र उसके 134 करोड़ लोगों की चेतना में बसा है। हिंसा के बावजूद उस पर सवाल नहीं किया जा सकता, यह हमारा अंतिम निष्कर्ष है।

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