बिना तेल एंबुलेंस खुद ही बीमार पड़ गई

नेरवा—जब दवा ही दर्द बन जाए तो सुकून कैसा। जी हां यह बात लोगों के स्वास्थ्य की रक्षक 108 एंबुलेंस सेवा पर खरी उतरती है। नेरवा चौपाल में लोगों को ऐन वक्त पर यह सुविधा नहीं मिल रही है, यदि मिल भी जाए तो मरीजों को आधे रास्ते उतारना आम हो गया है। ऐसा ही एक मामला बुधवार को भी सामने आया। नेरवा में दर्जी का कार्य करने वाले बलि राम को अटैक आने पर नेरवा अस्पताल ले जाया गया, जहां से उसे आईजीएमसी शिमला रैफर किया गया। नेरवा में खड़ी 108 में तेल न होने के कारण चौपाल से 108 मंगवाई गई। मरीज को इस एंबुलेंस में शिमला ले जाया जा रहा था इस दौरान पहले तो अस्पताल के गेट पर ही इसकी वायरिंग शार्ट हो गई। चालक ने किसी तरह जुगाड़ कर इसे चौपाल से करीब तीन किलोमीटर पहले छामधार तक पहंुचाया जहां पर यह फिर खराब हो गई। इसके बाद एक और 108 एंबुलेंस को छामधार बुलाया गया। इस एंबुलेंस ने मरीज को चौपाल तक पहंुचाया। आखिर तीमारदारों ने चौपाल से तीन हजार रुपए में टैक्सी बुक कर मरीज को आईजीएमसी पंहुचाया। इस दौरान मरीज की जिंदगी से हुए खिलवाड़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसे नेरवा से शिमला 125 किलोमीटर पंहुचने में ही 12 घंटे से अधिक का समय लग गया। बलि राम के साथ आये तीमारदारों देवेंद्र नौराइक, सोनू, लायक राम व मोहन ने आरोप लगाया कि 108 सेवा की वजह से उनके मरीज की जान खतरे में पड़ गई थी, जिस वजह से उन्होंने टैक्सी से ही मरीज को आईजीएमसी पहुंचाने में बेहतरी समझी। नेरवा से शिमला पंहुचने में मात्र चार घंटे का समय लगता है परंतु 108 की लापरवाही की वजह से उन्हें मरीज को शिमला पंहुचाने में 12 घंटे का समय लग गया। नेरवा अस्पताल से मरीज को बुधवार को तीन बजे शिमला के लिए रेफर कर दिया गया था जबकि उसे 12 घंटे बाद रात तीन बजे आईजीएमसी पंहुचाया गया। उल्लेखनीय है कि किसी समय लोगों के स्वास्थ्य की प्रहरी माने जाने वाली 108 सेवा सफेद हाथी बन चुकी है। उधर, इस विषय में 108 के मंडलीय प्रबंधक आकाशदीप से बात करने पर उन्होंने बताया  कि सभी गाडि़यां तय माइलेज से अधिक चल चुकी है, जिस वजह से यह अकसर खराब हो जाती है। गाडि़यों को पर्याप्त तेल उपलब्ध करवाने की पूरी कोशिश की जाती है, परंतु कई बार यह समस्या भी उत्पन्न हो जाती है। उन्होंने कहा कि 108 के लिए एक सौ नई गाडि़यों के टेंडर लग चुके हैं जिसके बाद यह समस्या हल हो जाएगी।

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