भयंकर त्रासदी की ओर पर्यावरण

शक्ति चंद राणा

लेखक, मलघोटा से हैं

एक पेड़ को युवा होने के लिए तीस से चालीस वर्ष लग जाते हैं, लेकिन काटने को हम दस मिनट नहीं लेते। पेड़ों को काटते समय अगर हमारे हृदय में पीड़ा नहीं होती, तो हमें इनसान कहलाने का हक नहीं, हम पत्थर ही हैं, भले चल व सांस ले रहे हैं। जब प्रकृति प्रतिशोध पर उतरेगी, तब हमारे तमाम मत, धर्म, मजहब धरे रह जाते हैं…

पर्यावरण के बिगड़ते संतुलन को देखते हुए दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने भविष्यवाणी की है कि धरती के पास अब मात्र 12 वर्ष अपने बचाव अथवा इसकी प्रलय को झेलने के लिए आज की परिस्थितियों के अनुसार शेष हैं। अब वह विश्व के सभी देशों और महाशक्तियों की सोच व कदमों पर निर्भर है कि वे विश्व को इस आने वाली भयंकर विनाशकारी त्रासदी से निकाल पाते हैं अथवा इसे इसकी नियति पर छोड़ देते हैं। पैरिस में कुछ वर्ष पूर्व हुए पर्यावरण को लेकर सम्मेलन में भारत ने समूचे विश्व का आह्वान किया था कि हम सब निहित स्वार्थ त्याग कर विश्व को इस संभावित प्रलय से बचाने के लिए व्यापक पग उठाएंगे, परंतु ऐसा देखा गया है कि ऐसे प्रयासों का हश्र वही होता है कि जब किसी बैठक का आयोजन होता है, तो सभी कुछ देर के लिए इसकी गंभीरता के प्रति गंभीर बनते हैं और फिर धीरे-धीरे वह उत्सव वैसे ही क्षीण होता जाता है जैसे श्मशान पर गए लोग जीवन की क्षण भंगुरता को लेकर सचेत होते हुए वैराग्य से भर जाते हैं। उनको लगता है कि वे बिना मतलब इन सांसारिक झमेलों में फंसे हैं, लेकिन जब वहां से घर वापसी का सफर शुरू होता है, तो वे तमाम त्याग, बलिदान वैराग्य की भावनाएं नदारद होती चली जाती हैं और हम पुनः उसी मोह-माया से ग्रसित होकर अपने मूल व वास्तविक लक्ष्य से भटक कर फिर उसी दलदल में फंसते चले जाते हैं।

ऐसा ही कुछ पर्यावरण की दशा में सुधार लाने के लिए बुलाए गए राष्ट्रव्यापी अथवा विश्वव्यापी सम्मेलनों का हश्र होता है। सब भूलकर वैसे ही पर्यावरण से छेड़छाड़ में न चाहते हुए भी लग जाते हैं। आज बेमौसम की बरसात, बर्फबारी, तेज आंधियां, तूफान, सुनामियां अथवा अन्य प्राकृतिक आपदाएं एक प्रकार से प्रकृति की ओर से निरंतर भेजी जाने वाली चेतावनियां हैं, जिनकी अनदेखी या उन संदेशों को दरकिनार करने की खसलत, गफलत विश्व को महंगी पड़ने वाली है। पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ व अमैत्रीपूर्ण व्यवहार का ही परिणाम है कि हम आए दिन विश्व के किसी न किसी भाग में प्रकृति का रौद्र रूप देख रहे हैं। ऐसा कहा गया है कि प्रकृति के पास हमारी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन मौजूद हैं, परंतु हमारे लालच को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। प्रकृति का अमानवीय  शोषण जिन प्राकृतिक आपदाओं को आमंत्रित कर रहा है, उनको देखते हुए हम स्वयं ही अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारते जा रहे हैं। एक समय था जब इस पृथ्वी पर रहने वाले तमाम लोग प्रकृति के बहुत ही करीब थे। उनकी आर्थिकी, उनका जीवनयापन वनों पर निर्भर था। उन लोगों में आज के जैसा लोभ, लालच, प्रकृति के साथ आज की तरह का शत्रुतापूर्ण रवैया नहीं था। विश्व में अंधाधुंध बढ़ती आबादी और उससे संबंधित उसकी जरूरतों की आपूर्ति भी पर्यावरण संतुलन को बिगाड़ने की एक बड़ी वजह बना है। आप इस बात से सहमत होंगे कि विश्व की बढ़ती जनसंख्या के दबाव के चलते देश उनकी जरूरतों को पूरा करने में लगे हैं, जिसके लिए उद्योगों, कृषि और हर पहलू में उत्पादन दिन दोगुना-रात चौगुना करने की होड़ लगी है, लेकिन इसके विपरीत उसी उत्पादन के कारण जो कचरा निकल रहा है, उसके सही तथा वैज्ञानिक ढंग से निस्तारण की कोई कारगर व्यवस्था कर नहीं पाए।  न कोई मार्गदर्शन, न ही उचित निर्देश सरकारों द्वारा विचार कर जारी किए गए। भारत का ही उदाहरण ले लें। लोग लाखों रुपए गांव में मकान पर व्यय कर देते थे, लेकिन शौच के लिए खुले में जाते थे। आज आवारा गउएं, पशु सड़कों पर कितनी दुर्घटनाओं का कारण बन रहे हैं, लेकिन कोई कारगर नीति इनको लेकर सरकार नहीं लाई। वजह यह है कि यह सरकार की प्राथमिकता में नहीं आता है। उनको पांच साल सत्ता में रहना होता है, चाहे देश जाए भाड़ में। ऐसा ही नहीं कि इस दिशा में काम नहीं हुआ, लेकिन स्वच्छता अभियान जन-जन का आंदोलन-2014  में बना।

जिस तरह से स्वच्छता आंदोलन में लोगों ने अपनी भागीदारी देकर इसे अपना आंदोलन बना लिया था। आज यदि पर्यावरण की बिगड़ती दशा को भारत तथा विश्व में सुधार लाना है, तो ऐसा ही एक परिणाममूलक आंदोलन सारे विश्व और खासकर उन देशों में चलाने की जरूरत है, जिनसे पर्यावरण को अधिक खतरा उत्पन्न हो रहा है। गर्मियों का मौसम आरंभ हो चुका है। इसमें जरा सी एक चिंगारी हजारों लाखों पेड़-पौधों, जानवरों, पशुओं-पक्षियों उनके अंडों, बच्चों को तबाह कर देती है। हम ऐसा करके घोर पाप के भागीदारी बनते हैं। श्मशान में शवदाह के लिए हमें अधिक से अधिक तीन या चार क्विंटल लकड़ी की दरकार होती है, परंतु हम अपनी पुरानी परंपरा के चलते या आदतन बहुत ज्यादा लकड़ी ढोकर शवदाह में इस्तेमाल कर देते हैं। आग में आप सारे विश्व की लकड़ी जलाने के लिए डालते रहेंगे, वह तब भी कभी तृप्त नहीं होगी। लालच की भूख भी वैसी ही है। अतः आवश्यकता है इस ओर जन-जन को जागरूक करने की।

एक पेड़ को युवा होने के लिए तीस से चालीस वर्ष लग जाते हैं, लेकिन काटने को हम दस मिनट नहीं लेते। पेड़ों को काटते समय अगर हमारे हृदय में पीड़ा नहीं होती, तो हमें इनसान कहलाने का हक नहीं, हम पत्थर ही हैं, भले चल व सांस ले रहे हैं। जब प्रकृति प्रतिशोध पर उतरेगी, तब हमारे तमाम मत, धर्म, मजहब धरे रह जाते हैं। तब वह नहीं पूछती कि आप किस मजहब, धर्म के हैं, उसे तो जो सामने आएगा, मिटाना ही होता है। अंत में केवल इतना सा आग्रह कर इस बात को समाप्त करना चाहता हूं कि हम स्वयं पहल करें, सरकारों पर निर्भर न रहें। गांवों में आज भी इस बात को लेकर आगे बढ़ने की अपार संभावनाएं हैं। जरूरत एक प्रेरणादायी नेतृत्व की है और दिशा देने की आवश्यकता है।

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