भाजपा पर भारी पड़ सकती है डाक्टरों की कमी

धर्मशाला   —कांगड़ा संसदीय क्षेत्र में मोदी लहर पर लचर स्वास्थ्य सेवाएं कहीं भारी न पड़ जाएं। जिला मुख्यालय से लेकर उपमंडल तक विशेषज्ञ डाक्टरों की कमी और पुरानी मशीनों सहित तकनीकी स्टाफ की कमी मरीजों का दर्द बढ़ा रही हैं। भले ही सरकारें नई योजनाएं लाने के दावे कर रही हों, लेकिन धरातल पर हालात ठीक नहीं है। आलम यह है कि लोगों के जिला भर में सरकारी संस्थानों में आंखों के आपरेशन तक नहीं हो रहे हैं। मोबाइल यूनिट को भी अस्पताल तक सीमित बना दिया है।  विशेषज्ञ डाक्टर न मिलने और लंबी लाइनों में परेशान होने वाले लोग अब व्यवस्थाओं में सुधार न कर पाने के कारण सरकार व उनके नेताओं को कोस रहे हैं।  स्वास्थ्य महकमे में सरकार के बड़े सुधार के दावे धरातल पर खोखले नजर आ रहे हैं। जिला मुख्यालय से लेकर छोटे अस्पतालों तक सरकार दावा कर रही थी, कि डाक्टरों सहित तकनीकी स्टाफ की कोई कमी नहीं रहेगी, लेकिन मौजूदा दौर में हालात कुछ और ही हैं। बैजनाथ, चढियार, पंचरुखी, शाहपुर, ज्वालामुखी, कांगड़ा व  नूरपुर में डाक्टरों की भारी कमी है।  दर्जनों पीएचसी  बिना स्टाफ के हैं। ज्वालामुखी में सफाई व्यवस्था बेहाल है। पंचरुखी में दो साल से टेस्ट नहीं हो रहे हैं।  कांगड़ा में कई पद रिक्त पड़े हुए हैं। क्षेत्रीय अस्पताल धर्मशाला की हालत ही देखें तो यहां एक दर्जन विशेषज्ञ डाक्टरों की कमी चल रही है। प्रमुख विभागों में एक-एक डाक्टर होने के कारण न तो नियमित ओपीडी चल पाती है और न ही मरीजों को सही उपचार मिल पाता है। हालात यह हैं कि डाक्टर छुट्टी चले जाएं या अन्य सरकारी कार्य के चलते ड्यूटी पर न आ पाएं तो मरीज सुबह से परेशान होते रहते हैं। यहां डाक्टरों के 33 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से 12 विशेषज्ञों के पद खाली चल रहे हैं। जिला के अन्य अस्पतालों में भी विशेषज्ञ डाक्टरों के दर्जनों पद खाली हैं, जिसके चलते वह रैफरल अस्पताल बन कर रह गए हैं। ऐसे में लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं न मिलने के चलते निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है। जिससे अब लोगों का गुस्सा फूटने लगा है। लोग कह रहे हैं कि जो लोग वेसिक सुविधाएं मुहैया नहीं करवा पा रहे हैं वह अन्य सुविधाएं क्या देंगे।

ये ओपीडी राम भरोसे

क्षेत्रीय अस्पताल धर्मशाला में अति महत्त्वपूर्ण ओपीडी ही राम भरोसे चल रही है। इनमें एक मात्र डाक्टर ही अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं, इनके अवकाश व अन्य स्थान पर ड्यूटी होने पर मरीजों को बेहाल होना पड़ रहा है। इनमें मेडिसिन ओपीडी में एक, गायनी में एक, आर्थो में एक, चर्म रोग में एक और मनोचिकित्सक भी एक पद के सहारे चल रही है।

धर्मशाला जाने के बजाय टांडा जा रहे मरीज

धर्मशाला अस्पताल में एमर्जेंसी में पहुंचने वाले मरीजों को सीधे टांडा रैफर कर दिया जाता है। अब लोग भी कहने लगे हैं कि जब मरीजों को रैफर ही करना है, तो सीधे टांडा  ही जाएंगे। ऐसे में लोग धर्मशाला अस्पताल का अब दूसरा नाम रैफर टू टांडा पुकार रहे हैं। इसके कारण अब धर्मशाला अस्पताल डिस्पेंसरी बनने की कगार पर पहंुच गया है। इतना ही नहीं, अस्पताल में डाक्टरों की कमी के कारण मरीजों के साथ-साथ सेवाएं प्रदान करने वाले चिकित्सकों को भी स्टाफ की कमी के कारण परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं।  जिला ही नहीं पड़ोसी जिला चंबा के मरीज भी इलाज करवाने के लिए धर्मशाला में पहुंचते हैं। लेकिन स्वीकृत पद होने के बावजूद आधे के करीब मात्र 21 पदों पर ही अब तक चिकित्सक अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे थे।

You might also like