भावों के तूफान में

May 11th, 2019 12:05 am

ओशो

मुझे लगता है कि मैं हमेशा भावों के तूफान में घिरा रहता हूं, इससे बाहर कैसे निकलना? मैंने सिर्फ  निरीक्षण करके देखा है, लेकिन जैसे ही एक भाव चला जाता है, दूसरा आ खड़ा होता है। हर उस भाव को जियो जिसे तुम महसूस करते हो। वह तुम ही हो। घृणा से भरे, कुरूप, अपात्र, जो भी हो उसमें रहो। पहले भावों को एक मौका दो पूरी तरह चेतन मन में आने का। अभी जागरूकता के प्रयास में तुम उन्हें अवचेतन में दबा रहे हो । फिर तुम अपने रोजमर्रा के कामों में उलझ जाते हो और उन्हें जबरदस्ती दबा देते हो। उनसे निजात पाने का यह तरीका नहीं है। उन्हें बाहर आने दो, उन्हें जियो। यह कठिन और दूभर होगा, लेकिन अपरिसीम रूप से लाभदायी। एक बार तुमने उनको जी लिया, उनकी पीड़ा झेली और उन्हें स्वीकार किया कि यह तुम हो कि तुमने खुद को इस तरह नहीं बनाया है इसलिए तुम्हें खुद का धिक्कार नहीं करना चाहिए कि तुमने खुद को इसी तरह पाया है। एक बार तुम उन्हें होश पूर्वक जी लेते हो बिना किसी दमन के, तुम आश्चर्य चकित होओगे कि वे अपने आप विलीन हो रहे हैं। तुम्हारी गर्दन पर उनकी पकड़ ढीली हो रही है, तुम्हारे ऊपर उनकी ताकत कम हो रही है और जब वे विदा होते हैं तब वह समय आ सकता है जब तुम साक्षीभाव से देखना शुरू करोगे। एक बार सब कुछ चेतन मन में आता है, तो वह खो जाता है और जब सिर्फ  एक छाया रहती है, तो वह समय होता है होश पूर्वक देखने का। अभी तो वह खंडित मन पैदा करेगा, बाद में वह बुद्धत्व पैदा करेगा। जब भय हो तो कुछ करने के लिए क्यों पूछते हो? भयभीत होओ! द्वंद्व क्यों पैदा करना। जब भय के क्षण आएं तो डरो, कांपने लगो और भय को हावी हो जाने दो। यह सतत प्रश्न क्यों कि क्या करें? क्या तुम जीवन को किसी तरह अपने ऊपर हावी नहीं होने दे सकते। जब भय होता है तब तूफान में कांपते हुए पत्ते की भांति कंपो और वह सुंदर होगा। जब वह चला जाएगा, तुम शांत और निस्तरंग महसूस करोगे, ठीक वैसे ही जैसे कोई तेज तूफान गुजर जाता है तो सब कुछ शांत और नीरव हो जाता है। हमेशा किसी न किसी चीज से लड़ना क्यों। भय होता है, वह नैसर्गिक है बिलकुल नैसर्गिक। ऐसे आदमी की कल्पना करना जो कि भय विहीन हो, असंभव है क्योंकि वह मुर्दा होगा। तब कोई रास्ते पर भोंपू बजा रहा होगा और निर्भय आदमी चलता चला जाएगा, वह फिक्र ही नहीं करेगा। रास्ते में एक सांप आएगा और निर्भय आदमी फिक्र नहीं करेगा। भय न हो तो आदमी बिलकुल मूर्ख और बेवकूफ  होगा। भय तुम्हारी बुद्धि का हिस्सा है, उसमें कुछ भी गलत नहीं है। भय केवल यही दिखाता है कि मृत्यु है और हम इनसान यहां सिर्फ  कुछ क्ष्णों के लिए हैं। वह कंपन यह कह रहा है कि हम सदा यहां नहीं रहेंगे, हम शाश्वत रूप से यहां नहीं हैं, कुछ दिन और तुम विदा हो जाओगे। सच तो यह है कि भय के कारण मनुष्य धर्म की गहरी खोज करता है अन्यथा कोई सवाल नहीं होता।

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