मजबूती की तलाश में डेयरी फार्मिंग

प्रताप सिंह पटियाल

लेखक, बिलासपुर से हैं

 

एक ओर दुधारू पशुओं की भारी-भरकम कीमतें, दूसरा इनके लिए दुकानों से उपलब्ध चारे की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिस कारण कृषि संबंधी अर्थव्यवस्था को परिभाषित करने वाले पशुपालन व्यवसाय भी संकट की स्थिति में है। इसलिए सरकारों को पशुपालकों को पेश आ रही चुनौतियों से निपटने के विकल्पों पर विचार करना होगा…

हिमाचल प्रदेश में भले ही बागबानी तथा पर्यटन को आर्थिकी का मुख्य स्रोत माना जाता है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिकी को मजबूत करने में दुग्ध उत्पादन की महत्त्वपूर्ण भागीदारी है। बढ़ती जनसंख्या के मद्देनजर दूध की मांग प्रतिदिन बढ़ रही है। दूध हर घर-परिवार की जरूरत ही नहीं है, बल्कि दुग्ध पदार्थ दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। पुरातन से देश में कृषि के साथ पशुपालन किसानों का पुश्तैनी व परंपरागत व्यवसाय रहा है। आज भी देश में 70 फीसदी कृषक पशुपालन व्यवसाय से जुड़े हैं। वर्तमान में हिमाचल के पशुपालक साहिवाल, गीर, रेडसिंघी तथा गंगागिरी जैसे देशी गौवंश के साथ हॉलीस्टीन, जर्सी फ्रीजियन तथा ब्राउन स्वीस जैसी विदेशी प्रजाति की गऊएं भी पाल रहे हैं। राज्य के निचले जिलों में गोपालन के साथ मुर्राह, नीलीरावी सुर्ती तथा भदावरी जैसी उत्कृष्ट नस्ल की भारी कीमतों की भैसों के पालने का क्रम भी जारी है। जबकि पहाड़ की भौगोलिक संरचना व विकट परिस्थितियां देश के बाकी राज्यों से कहीं अलग हैं, लेकिन पशुपालन व्यवसाय में फिर भी कृषकों का उत्साह है।

ज्ञात रहे देश में भैसों की 23 प्रजातियों में से 12 नस्लों को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद तथा नस्ल पंजीकरण समिति ने मान्यता दी है। जिस प्रकार साहिवाल नस्ल की गाय का दूध श्रेष्ठ गुणवत्तायुक्त माना गया है, उसी प्रकार भदावरी प्रजाति की भैंस को दूध व घी के लिए उम्दा नस्ल माना गया है। 15 से 20 लीटर दूध देने वाली मुर्राह की अपेक्षा इसमें दूध देने की क्षमता थोड़ी कम हो सकती है, लेकिन इसके दूध में (एसएनएफ) सोलिड मौट फैट अधिक मात्रा में है तथा घी उत्तम श्रेणी में आंका गया है। भारत 1998 से विश्व में सर्वाधिक दुग्ध उत्पादन की 18.5 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ शीर्ष पर काबिज है, लेकिन प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता में न्यूजीलैंड 9773 ग्राम के साथ शीर्ष पर है। भारत में यह औसत 375 ग्राम प्रति व्यक्ति तथा अपने राज्य में यह औसत 542 ग्राम प्रति व्यक्ति है। विश्व में पशुपालन में भी भारत शीर्ष पर है। दुनिया के पशुधन का पांचवां हिस्सा भारत में मौजूद है, लेकिन चरागाहों के मामले में देश वैश्विक स्तर पर पिछड़ गया है। कुछ समय देश में पशुओं की चरागाहों में सियासी रुतबे के अतिक्रमण तथा विकास की मिनारों ने चरना शुरू कर दिया, जिस कारण लाखों की संख्या में गोधन सड़कों की धूल फांक कर सियासी साए की उम्मीद में आशियाना तलाश रहा है। चरागाहों के प्रबंधन में शून्य मात्र प्रयासों से सिमटते चरांद व घास में खरपतवार की बढ़ोतरी तथा ग्लोबल वार्मिंग के प्रकोप जैसी परिस्थितियों के कारण पशुचारा समस्या से जूझ रहे कृषकों के लिए यह जिक्र करना प्रासंगिक है कि केरल व गोवा जैसे सीमित चरागाह भूमि वाले राज्यों में कई कृषक हरा पशुचारा उत्पादन के लिए ‘हाईड्रोपोनिक्स’ तकनीक का सहारा ले रहे हैं। इस तकनीक से तैयार किए गए चारे में ‘क्रूड प्रोटीन’ की मात्रा 13.5 प्रतिशत तक आंकी गई है, जो सामान्य चारे से अधिक है। इस  तकनीक से चरी, बाजरा व जई आदि गुणवत्तायुक्त हरा चारा जल्दी तैयार होता है तथा खर्च व पानी की लागत भी कम है। छोटे स्तर के पशुपालकों के लिए यह तकनीक अधिक कारगर है, इससे पूरा वर्ष चारा उपलब्ध रहता है। भीड़ग्रस्त शहरी क्षेत्रों में लोग इस तकनीक से सब्जी उत्पादन भी कर रहे हैं। बहरहाल मिलावटखोरी के इस दौर में स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभावों के कारण लोगों का रुझान सीधा दुधारू पशुओं से प्राप्त ताजे दूध की तरफ बढ़ने से डेयरी फार्मिंग व्यवसाय आज समय की मांग बन चुका है। डेयरी प्रोडक्टों की मांग बाजारों में जोरों पर है। देश में दुग्ध उत्पादों के लिए बाजार पूरा वर्ष सक्रिय रहते हैं, लेकिन पहाड़ के दूर-दराज के क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं का ढांचा पूरी तरह विकसित न होने से पशुपालकों को दुग्ध उत्पादों के लिए उचित विक्रय बाजार तथा दूध के वाजिब दाम नहीं मिलते।

एक ओर दुधारू पशुओं की भारी-भरकम कीमतें, दूसरी ओर इनके लिए दुकानों से उपलब्ध चारे की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिस कारण कृषि संबंधी अर्थव्यवस्था को परिभाषित करने वाले पशुपालन व्यवसाय पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इसलिए सरकारों को पशुपालकों को पेश आ रही चुनौतियों से निपटने के विकल्पों पर गंभीरता से विचार करना होगा, ताकि पशुपालन व्यवसाय व्यावहारिक बने, जो कि दम तोड़ रही कृषि के बाद किसानों को वित्तीय संकट से उबार कर उनका आर्थिक पक्ष मजबूत कर सकता है। यह व्यवसाय ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़ा है। यदि पशुपालकों को दुग्ध उत्पादन का लागत के अनुरूप उचित दाम मिले, तो निश्चय ही गांव समृद्ध होंगे। गांवों की समृद्धि का संबंध सीधा देश की प्रगति से जुड़ा है।

आर्थिक संभावनाओं के द्वार खोलने वाला किसानों का यह पुश्तैनी व्यवसाय बेरोजगारी की मार झेल रहे युवा वर्ग के लिए स्वरोजगार से जुड़ने का साधन भी है। इसलिए यदि इसके प्रोत्साहन के लिए सार्थक प्रयास हों, तो राज्य में शून्य लागत कृषि की जो कवायद जारी है, उस समावेशी कृषि पद्धति के विकास के लिए देशी खाद अधिक मात्रा में अत्यंत जरूरी है। डेयरी फार्मिंग के प्रोत्साहन से ही पशुधन को सड़कों पर लावारिस छोड़ने की रिवायत पर कुछ हद तक विराम लगेगा तथा प्रतिदिन दूसरे राज्यों से पोलिथीन की थैलियों में करोड़ों रुपए के आयात हो रहे दूध पर निर्भरता कम होगी। अतः लाजिमी है कि कई समस्याओं के भंवर में फंसे पशुपालकों की निराशा को करीब से समझकर इनकी हिमायत करके पशुधन का महत्त्व बढ़ाने पर बल दिया जाए, ताकि देश की अर्थव्यवस्था में परिवर्तन लाने की कुव्वत रखने वाला पशुपालन व्यवसाय का वजूद जिंदा रह सके।

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