मनुष्य का शरीर देव-मंदिर है

इस प्रकार वह ब्रह्मांड का एक अंश है। मनुष्य का शरीर देव मंदिर है तथा उसमें इष्टदेव का चिर निवास है, किंतु अज्ञानवश हम उसे जानने में असमर्थ रहते हैं। इष्टदेव की अपार शक्ति को अपनी क्रियाशक्ति के द्वारा पहचानने और उसकी सुषुप्ति को चैतन्य बनाकर आत्मकल्याण प्राप्त करने के लिए पूर्वाचार्यों ने अनेक मार्ग खोज निकाले हैं जिनमें एक मार्ग है-कुंडलिनी साधना:

सशैल वनधात्रीणां यथाधारोअहिनायकः।

सर्वेषां योगतंत्राणां तथाधारो हि कुंडली।।

अर्थात जिस प्रकार समस्त पृथ्वी, वन, पर्वत आदि के आधार अधिनायक श्री विष्णु हैं, उसी प्रकार समस्त योग और तंत्र का आधार कुंडली है…

-गतांक से आगे…

इस प्रकार वह ब्रह्मांड का एक अंश है। मनुष्य का शरीर देव मंदिर है तथा उसमें इष्टदेव का चिर निवास है, किंतु अज्ञानवश हम उसे जानने में असमर्थ रहते हैं। इष्टदेव की अपार शक्ति को अपनी क्रियाशक्ति के द्वारा पहचानने और उसकी सुषुप्ति को चैतन्य बनाकर आत्मकल्याण प्राप्त करने के लिए पूर्वाचार्यों ने अनेक मार्ग खोज निकाले हैं जिनमें एक मार्ग है-कुंडलिनी साधना ः

सशैल वनधात्रीणां यथाधारोअहिनायकः।

सर्वेषां योगतंत्राणां तथाधारो हि कुंडली।।

अर्थात जिस प्रकार समस्त पृथ्वी, वन, पर्वत आदि के आधार अधिनायक श्री विष्णु हैं, उसी प्रकार समस्त योग और तंत्र का आधार कुंडली है। पुराणों में अध्यात्म भाव को नारायण, पुरुष, शिव और ब्रह्म आदि कहा गया है। छांदोग्योपनिषद में वर्णित है कि जब पुरुष अथवा परमशिव ने अनेक होने की इच्छा की तो प्रथम स्पंदन अहम् और द्वितीय स्पंदन इदम् हुआ। अध्यात्म भाव (ब्रह्म) में स्पंदन होने पर भूत भाव की निसृति और भूत भाव से विसर्ग भाव जाग्रत होता है। यही सृष्टि का आरंभ है। यह विसर्ग भाव ही प्रकृति अथवा शक्ति है। विष्णु को शेषशायी दिखाया गया और शिव के साथ सर्प लिपटे दर्शित किए गए। ये सब पुरुष और प्रकृति अथवा शिव और शक्ति के संयोग के प्रतीक हैं। भारतीय ऋषियों ने इस पृथ्वी को शेषनाग के फन पर रखा बताया है।

यह सर्प भी शक्ति का प्रतीक है। इस संबंध में ‘श्वेताश्वतरोपनिषद’ में कहा गया है ः

ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन।

देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढ़ाम।।

अर्थात अपने ही गुणों (सत, रज, तम) से आच्छादित इस देवात्मक शक्ति के दर्शन ऋषियों ने ध्यान द्वारा किए। यह शक्ति जिसे विष्णु की शैया, शिव का आभूषण या पृथ्वी को धारण करने वाले शेषनाग के रूप में चित्रित किया गया है, वह मनुष्य के शरीर में स्थित है। यह शरीर इसी देवात्म शक्ति पर आधारित है।     

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