मिट्टी में मिलने लगा महल मोरियां किला

सिर्फ दीवारों से ही हो रही पहचान, चुनावी मौसम में ही होती है जीर्णोद्वार की बातें

भोरंज –उपमंडल भोरंज का महल मोरियां किला इन दिनों रखवाली का मोहताज है। बस चुनावी मौसम में इसके जीर्णाेद्वार की बातें होती हैं, बाद में यह मुद्दा दफन हो जाता है।  इस ऐतिहासिक किले का वजूद कब समाप्त हो जाए पता नहीं। हर बार इसके संरक्षण को लेकर टाल मटोल वाली स्थिति दखने को मिलती है। महाराज संसार चंद का यह किला अब सिर्फ इसकी पूरी तरह टूट चुकी दीवारों से ही पहचाना जाता। जिस दिन दीवारें पूरी तरह ध्वस्त हुईं, इसका वजूद भी मिट्टी में मिल जाएगा। इस किले को संसार चंद ने 1775-1823 में बनवाया था। इस किले तक पहुंचना आसान नहीं। जंगल के बीच पैदल चलकर ही इस तक पहुंचा जा सकता है। किला कुनाह खड्ड से करीब 50 से 55 मीटर ऊपर होगा और किले की ऊंचाई भी इतनी ही होगी।  कहते हैं कि किले के टॉप फ्लोर से एमर्जेंसी एक्सिट के लिए एक सुरंग बनाई गई थीं जो सीधी जाकर नीचे खड्ड के उस पार निकलती थी। माना जाता है कि किले में अथाह सोना दबा हुआ है। इस सोने को निकालने की जिसने भी कोशिश की, वह खाली हाथ ही लौटा। कभी गांववासी वापस भेज देते हैं तो कभी पुलिस पिटाई कर देती है। किले से कुछ दूर एक नौण भी है, जिसका रखरखाव स्थानीय पंचायत कर रही है। इस किले को संजोने और संवारने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहा। न पुरातत्व विभाग, न ही पर्यटन व प्रशासन और न ही जनप्रतिनिधि इसके जीर्णाेद्वार में रुचि दिखा रहे हैं। इसके चलते महल मोरियां का यह किला इतिहास के पन्नों में दफन होता प्रतीत हो रहा है। हर चुनावी शोर में महल के किले का मुद्दा उठता है। चुनाव के बाद किले की बात तक नहीं होती। हालांकि स्थानीय पंचायत जरूर किले से दूर किले से संबंधित नौण को संजोने का प्रयास कर रही है।

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