मूलभूत सुविधाओं को तरसी बौर पंचायत

नेरवा—आज़ादी के सात दशक बीतने के बावजूद उपमंडल चौपाल की बौर पंचायत मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही है। इन सात दशकों में इतना जरूर होता आया है कि चुनावी मौसम में विभिन्न दलों के नुमाइंदे वोट मांगने पंचायत में आते हैं और आश्वासनों का झुनझुना देकर चले जाते हैं। चुनाव होने के बाद लोगों से किये वादे भूल कर यहां की समस्याओं से मुंह फेर लेते हैं। 72 सालों में कई सरकारें आई और चली गई परन्तु किसी भी सरकार ने पंचायत वासियों की सड़क, स्वास्थ्य, बिजली, पानी जैसी मूलभूत समस्याओं के प्रति संजीदगी दिखाने की जरूरत नहीं समझी, जिस वजह से यहां के लोगों में आक्रोश स्पष्ट देखा जा सकता है। पंचायत की इस अनदेखी के चलते सड़क, स्वास्थ्य, बिजली व पानी की समस्याओं से जूझ रहे बौर पंचायत के लोगों ने इस बार लोक सभा चुनावों में वोट नहीं डालने का निर्णय लिया है। लोगों का आरोप है कि किसी भी सरकार ने पंचायत वासियों की इन समस्याओं की सुध नहीं ली तो फिर वह वोट क्यों डालें। लोगों ने मूलभूत सुविधाओं की आशा में पंचायत के विभिन्न गांव में आलिशान घर बनाये थे परंतु सुविधाओं की कमी के चलते लोग गांव से पलायन कर चुके है। गांव खाली हो गए हैं व लोग सड़कों के किनारे बस गए हैं। बौर के लिए बनने वाली सड़क की प्रक्रिया 35 साल पहले 1984 में शुरू हो चुकी थी परंतु इन 35 सालों में पंचायत वासियों का सड़क से जुड़ने का सपना पूरा नहीं हो पाया है। स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल यह है कि सिरदर्द की एक गोली लेने के लिए 52 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। यही हाल बिजली पानी का है। पंचायत के लिए एक लिफ्ट स्कीम है जोकि अकसर खराब ही रहती है। बिजली का हाल यह है कि बल्व के साथ दीये जलाने पड़ते हैं। पंचायत के बुजर्गों का कहना है कि अब तो उन्होंने पंचायत में जीते जी सड़क देखने की ऊमीद ही छोड़ दी है। पंचायत की अनदेखी का एक दुःखद पहलू उस समय देखने को मिला जब गांव की एक महिला ने अपने हाथ दिखाते हुए बताया कि उसकी एक टांग काटने की वजह से वह गुम्मातक हाथों केसहारे ही आती जाती है जिस वजह से उसके हाथों में गुठलियां बन गई है। इसे पंचायत के लोगों के भाग्य की विडंबना ही कहा जाएगा कि एक तरफ  तो कुदरत ने यहां पर प्राकृतिक सुंदरता की ऐसी छटा बिखेरी है कि यहां से कहीं जाने को मन ही न करे, दूसरी तरफ सरकार की अनदेखी ने इस सुंदरता पर ग्रहण लगा दिया है व लोग इस रमणीक स्थान को छोड़ने पर मज़बूर हो गए हैं।

You might also like