मृत्युंजय जप कैसे करें

अब शिवयंत्र कहते हैं, प्रथम षटकोण यंत्र को लिखकर उसे महम में साध्य व्यक्ति का नाम लिखें और प्रसाद बीजों को लिखकर षट्कोणों में प्रणव सहित पंचाक्षरमंत्र वर्णों को लिखें तथा षडमंत्रों को भी लिखें। उसके बहिर्भाग पंचदल निर्माण कर उसमें ओउम ईशानाय नमः। ओउम तत्पुरुषाय नमः। ओउम अघोराय नमः। ओउम सद्योतजाताया नमः। ओउम वामदेवाय नमः-इन पांच मंत्रों को प्रागादि क्रम से लिखें। उस यंत्र के बहिर्भाग में अष्टदल निर्माण करके उन दलों में मातृकाओं के चरणों को लिखें। अष्टदल के बहिर्भाग को त्रयम्बक मंत्र से वेटिष्टत करें। इस यंत्र को जप होम आदि से पूजन कर धारण करें तो आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य की सिद्धि होती है…

-गतांक से आगे…

शिवयंत्र यथा-षटकोणमंडलं कृत्वा तदंते साध्यनामकम। प्रसादबीजं हौं संलिख्य यतः षटकोणेषु प्रणवसहित पंचाक्षरवर्णान षडंगमंत्रांश्च विलिख्य तद्वहिः पंचदलानि विरच्य तद्दते ओउम ईशानाय नमः। ओउम तत्पुरुषाय नमः। ओउम अघोराय नमः। ओउम सद्योजाताय नमः। ओउम वामदेवाय नमः। इति पंच मंत्रान प्रागादिकमेण लिखेत। तद्वहिरष्टदलानि रचयित्वा तद्दलेशु मातृकावर्णान लिखेत। तद्वहिर्वत्तं अयम्बकेण वेष्टयेत। एतद्यंत्रं जपहोमानादिना संपूज्य धारयेत। आयुरारोग्यै-श्वर्यादिसिद्धिर्भवति।

अब शिवयंत्र कहते हैं, प्रथम षटकोण यंत्र को लिखकर उसे महम में साध्य व्यक्ति का नाम लिखें और प्रसाद बीजों को लिखकर षट्कोणों में प्रणव सहित पंचाक्षरमंत्र वर्णों को लिखें तथा षडमंत्रों को भी लिखें।  उसके बहिर्भाग पंचदल निर्माण कर उसमें ओउम ईशानाय नमः। ओउम तत्पुरुषाय नमः। ओउम अघोराय नमः। ओउम सद्योतजाताया नमः। ओउम वामदेवाय नमः-इन पांच मंत्रों को प्रागादि क्रम से लिखें। उस यंत्र के बहिर्भाग में अष्टदल निर्माण करके उन दलों में मातृकाओं के चरणों को लिखें। अष्टदल के बहिर्भाग को त्रयम्बक मंत्र से वेटिष्टत करें। इस यंत्र को जप होम आदि से पूजन कर धारण करें तो आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य आदि की सिद्धि होती है।

मृत्युंजयमंखः अथवा शृणु देवेशि यंत्रं सर्वसुसिद्विदम। मध्येसज्याक्षराढयं धु्रवमभिविलिखेन्मध्यमं दिग्दलेषु कोणेष्वंत। मनोस्तत क्षितिभुवनमयो दिक्षु चंद्रं विदिक्षु। ढान्तं यंत्रं तदुक्तं सकलभयहरंक्ष्वेडभूतापमृत्युव्याधि व्यामोहदुः खपशमनमुदितं श्रीपदं कीर्तिदायि।।

मुत्युंजय यंत्र का चित्र अन्य तांत्रिक ग्रंथों में है। बुद्धिमान जन उन ग्रंथों को देखकर समझ सकते हैं। गं्रथ विस्तार के भय से यहां चित्र नहीं बनाया गया है। बिना चित्र के विशेष व्याख्या से साधारण पुरुषों का कुछ काम नहीं निकल सकता है। इस यंत्र का सांगोपांग पूजन करने से भी प्राप्ति होती है।      

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