मोदी का गरीबी-मुक्त भारत

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का नया नियुक्ति-पत्र सौंप दिया है। अब सिर्फ शपथ ग्रहण की औपचारिकता शेष है। भाजपा-एनडीए संसदीय दल का सर्वसम्मति से नेता चुने जाने के बाद मोदी ने नई सरकार, नए भारत के सफरनामे का एजेंडा भी घोषित कर दिया। चुनौतियों का उल्लेख तब करेंगे, जब मोदी विधिवत रूप से प्रधानमंत्री का दायित्व संभाल लेंगे, लेकिन उनका एजेंडा भी गौरतलब है। मोदी 2014 से ही अपनी गरीबी और पिछड़ेपन को नहीं भूले हैं। उन्होंने बार-बार इन स्थितियों का जिक्र किया है, क्योंकि भारत सरीखे विराट और विविध लोकतंत्र में एक बेहद गरीब और अराजनीतिक व्यक्ति का प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचना वाकई एक दुर्लभ उदाहरण है। अपने पांच साला कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी ने गरीबों से जुड़ी कई योजनाओं को सार्थक तौर पर लागू किया। उन्हीं आधारों पर चुनाव लड़ा और जनादेश सामने है। मोदी अकेले ऐसे गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री हैं, जिन्हें जनादेश में अपार बहुमत मिला, नतीजतन लगातार दो बार सत्ता हासिल हुई है। 1971 की इंदिरा गांधी सरकार से तुलना बेमेल है। बहरहाल अब दोबारा प्रधानमंत्री बनते हुए मोदी की दृष्टि और सोच स्पष्ट है कि देश को गरीबी-मुक्त बनाना है। उनके मुताबिक, अब देश में दो ही जातियां होंगी – गरीब और गरीबी से मुक्त कराने में मदद करने वाले लोग। यह आदर्श और नए भारत का राष्ट्रीय एजेंडा और संकल्प है। इस तरह प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट किया है कि जातियों, संप्रदायों, पंथों, धर्मों के ‘मकड़जाल’ तोड़ने पड़ेंगे। यह किया जा सकेगा, यह अलग सवाल है, लेकिन मोदी समाज और व्यवस्था पर जातियों को हावी नहीं होने देना चाहते हैं। बीते पांच सालों में भी मोदी की यह प्राथमिकता रही है, 2019 की सरकार भी गरीबों ने बनवाई है और अब भारत गरीबी के ‘कलंक’ से मुक्त होगा। विश्व में नई ऊंचाइयां छूने और विकसित राष्ट्र की पहचान बनाने के मद्देनजर भारत को इस कलंक से मुक्ति पानी ही होगी। गरीबों के हक के लिए हमें जीना-जूझना है, अपना जीवन खपाना है। संसद के ऐतिहासिक सेंट्रल हॉल में देश की स्वतंत्रता की घोषणा की गई, वहीं पहली राष्ट्रीय सरकार बनी और प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने वहीं शपथ ग्रहण की। उसी कक्ष से संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ आरोपिया अंदाज में कहा कि गरीबों के साथ जो छल किया जा रहा था, हमने उसमें छेद किया है। अब सीधा गरीब तक पहुंचना है। उन्होंने अल्पसंख्यकों के साथ भी छल की हकीकत को स्वीकार किया। प्रधानमंत्री का मानना है कि अल्पसंख्यकों को भ्रमित और भयभीत रखा गया। वोटबैंक राजनीति के मद्देनजर उन्हें डरा कर रखा गया और उन्हें अनपढ़, गरीब ही रहने दिया। अच्छा होता कि अल्पसंख्यकों की शिक्षा और उनके स्वास्थ्य की चिंता भी की जाती। बहरहाल अब प्रधानमंत्री मोदी का एजेंडा है कि उस छल में भी छेद किया जाएगा। दरअसल वह अल्पसंख्यकों का विश्वास जीतना चाहते हैं। यह भाजपा और मोदी की नई सियासत भी है, क्योंकि इन चुनावों में करीब 10-11 फीसदी मुसलमानों ने भी उनके पक्ष में वोट दिए हैं। यह एजेंडा आसान नहीं है। दरअसल जिस देश में गरीबी की परिभाषा और आधार ही तय नहीं हैं, तो गरीबी-मुक्त भारत कैसे संभव है? हालांकि चुनाव के दौरान और उसके बाद भी भाजपा 22 करोड़ लाभार्थियों की बात करती रही है। यानी इतने लोगों को गरीबी से बाहर लाने की सार्थक कोशिश की गई। यह संख्या कम-ज्यादा हो सकती है, लेकिन जो जमात 2000 रुपए मिलने से खुश है, जिनके घर-गांव में अब करीब 24 घंटे बिजली है, जहां अन्य सुविधाएं मुहैया कराई गई हैं, वे तो गरीबी से बाहर निकलने को संघर्षरत हैं ही। आज भी देश में 25 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी रेखा के तले जीने को विवश हैं। उन्हें उनके अभावों से मुक्त कराना वाकई एक जन-आंदोलन से कम नहीं होगा। बहरहाल देश मोदी सरकार के इस नए मिशन को देखना और परखना चाहेगा। जब विश्व के सबसे बड़े चुनाव का जनादेश भाजपा-एनडीए को मिला है, तो साफ है कि देश ने नई जिम्मेदारियां भी उन्हें सौंपी हैं। अब प्रधानमंत्री मोदी ने एक खूबसूरत बात भी कही है कि अब हमारा कोई पराया नहीं है, यह पूरे देश की सरकार है, सभी सांसद पूरे देश के हैं, लिहाजा यह एक सकारात्मक चुनाव भी माना जाना चाहिए। यदि कोई पराया नहीं है, तो फिर अमीर-गरीब की खाई क्यों है? गरीबी-मुक्त होने के लिए इस सवाल का खत्म होना भी जरूरी है।

 

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