मोदी लहर का जनादेश

2019 के जनादेश ने साबित कर दिया है कि चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी की लहर ही नहीं, बल्कि सुनामी बरकरार रही। नतीजतन नतीजे 2014 से भी बड़े और व्यापक रहे। भाजपा ने एक बार फिर अपने बूते बहुमत हासिल किया और 300 का आंकड़ा पार किया है। एनडीए ने गुरुवार सायं सात बजे तक 350 सीटों का आंकड़ा छुआ। इसी जनादेश के आधार पर सवाल किया जा सकता है कि क्या देश में एक खास तरह की राजनीति का युग स्थापित हो गया है और कांग्रेस का निरंतर क्षरण जारी है? इसका विस्तृत विश्लेषण बाद में किया जाना चाहिए, लेकिन आज समय मोदी और शाह का है। उनके ही अनथक प्रयासों के कारण भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने अभूतपूर्व जनादेश हासिल किया है। महाराष्ट्र में शिवसेना और बिहार में जनता दल-यू और एलजेपी की साझा चुनावी सफलताओं ने आसमान छुए हैं। यही कारण है कि महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी की चुनौती ध्वस्त कर दी गई और बिहार में कथित महागठबंधन का सूपड़ा साफ हो गया। मध्य भारत की 40 में से 37, पश्चिम भारत की 78 में से 73, पूर्वी भारत की 117 में से 73 और उत्तरी भारत की 151 में से 119 सीटें भाजपा-एनडीए ने जीत कर हासिल की हैं। हालांकि दक्षिण की 131 में से 32 सीटें ही एनडीए की झोली में आईं, लेकिन वह भी कामयाबी का एक बेहतर स्तर है, क्योंकि दक्षिण में भाजपा-एनडीए का विस्तार और राजनीतिक प्रभाव सीमित है। ‘मोदी की लहर’ मानने की बुनियादी दलील यह है कि यह जनादेश राष्ट्रव्यापी है और बिना लहर के संभव नहीं है। यह भी गौरतलब है कि केरल में भी उनके हिस्से की धूप खिली है। सुदूर पूर्वोत्तर की 25 में से 18 सीटें जीत कर भाजपा-एनडीए ने अपने स्थापित वर्चस्व को कायम रखा है। दरअसल जिन 159 सीटों पर दलित वोट निर्णायक हैं, वहां 90 से अधिक सीटें इस गठबंधन ने जीती हैं। मुस्लिम निर्णायक 103 सीटों पर भी करीब 55 सीटें हासिल की गई हैं। आदिवासियों की बहुलता और असर वाली 68 में से 50 सीटों पर भाजपा-एनडीए उम्मीदवार सफल रहे हैं, लिहाजा विश्लेषण यह होना चाहिए कि अब भाजपा बनियों, ब्राह्मणों और व्यापारियों की ही पार्टी नहीं रह गई है। बेशक उसका विस्तार हुआ है, लिहाजा जिन इलाकों में किसानों से जुड़े मुद्दे सुलगते रहे हैं या हावी रहे हैं, वहां भी ज्यादा जनादेश भाजपा-एनडीए के पक्ष में है। इतना व्यापक और विविध जनादेश किसी लहर या भावना के बिना संभव नहीं है। चूंकि यह चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में लड़ा गया था, तो इस स्वीकृति और व्यापकता का पहला श्रेय भी उन्हें दिया जाना चाहिए। अलबत्ता भाजपा जैसी काडर आधारित पार्टी में औसत कार्यकर्ता भी श्रेय का पात्र होता है। यदि कांग्रेस 50-55 सीटों तक सिमट कर रह गई है और समूचा विपक्ष अभियान छेड़ने के बावजूद मोदी, भाजपा-एनडीए की खूबसूरत जीत को थाम नहीं पाया है, तो दो निष्कर्ष तय लगते हैं। एक, देश के छोटे-छोटे इलाके और नागरिक तक प्रधानमंत्री मोदी की स्वीकृति और दूसरा, कांग्रेस समेत विपक्षी दलों का चुनावी रेस में होने से पहले ही हांफना…! यह जनादेश मोदी सरकार की योजनाओं और कार्यक्रमों पर औसत नागरिकों का राष्ट्रीय अभिमत भी है। आश्चर्य यह है कि दिसंबर, 2018 में जिन तीन राज्यों – मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने भाजपा को पराजित कर सफलता हासिल की थी और सरकारें बनाई थीं, वहां अब भाजपा ने उसका सूपड़ा साफ कर दिया है। 2014 के जनादेश की तर्ज पर इस बार भी भाजपा ने राजस्थान, गुजरात, दिल्ली, हिमाचल, उत्तराखंड आदि राज्यों में लगभग 100 फीसदी सीटें जीती हैं। यह किसी के नाम की ‘चुनावी सुनामी’ में ही संभव है। इनके अलावा, बंगाल, तेलंगाना और ओडिशा में शानदार सीटें जीत कर अपनी चुनौती पेश की है, नई राजनीतिक जमीन स्थापित की है। दरअसल इस जनादेश के साथ ही 21 राज्य ‘कांग्रेस मुक्त’ हो गए हैं। हमारा यह दावा नहीं है कि इतने राज्यों में कांग्रेस का खात्मा हो गया है। राजनीति में ऐसा संभव नहीं है, लेकिन इतने राज्यों में कांग्रेस का चुनावी प्रभाव बेहद क्षीण हो गया है, जनता ने उसे बिलकुल नकार दिया है। नतीजतन देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में कांग्रेस मात्र एक सीट तक सिमट कर रह गई है। उसके बड़े, राष्ट्रीय नेता चुनाव हारे हैं। बहरहाल 2019 का चुनाव संपन्न हुआ, जनादेश के जरिए भारत विजयी रहा, ऐसा प्रधानमंत्री ने भी माना है। अब नई सरकार की प्राथमिकताओं और चुनौतियों का दौर शुरू होगा। उसका मूल्यांकन तभी किया जाएगा, लेकिन दोबारा सत्ता के लिए प्रधानमंत्री, भाजपा और उनके साथियों को शुभकामनाएं।

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