राणा शिव सरण  सिंह ने बनवाए कई मंदिर

May 15th, 2019 12:03 am

राणा शिव सरण सिंह एक धर्मपरायण व्यक्ति था। उसने कई मंदिर बनवाए और ब्राह्मणों को दान दिया। उसने एक ‘दीवानखाना’ भी बनाया। इसके बाद उसका पुत्र किशन सिंह गद्दी पर बैठा। जब कांगड़ा से मुगलों का प्रभुत्व समाप्त हो गया तो वहां का ऐतिहासिक प्रसिद्ध किला दोबारा संसार चंद के हाथ आ गया…

 गतांक से आगे …

शिव सरण सिंह (1828-1840 ई.) : शिव सरण सिंह, राणा जगत सिंह का पुत्र था। इस राणा के समय में कांगड़ा राजा संसार चंद के पुत्र अनिरुद्ध चंद ने 1829 में अर्की में आकर शरण ली। पंजाब का महाराजा रणजीत सिंह उसकी दो बहनों का हाथ अपने वजीर ध्यान सिंह के पुत्र हीरा सिंह के लिए चाहता था। अनिरुद्ध अपने धर्म और मान मर्यादा का ध्यान रखते हुए रणजीत सिंह की यह बात मानने पर विवश था। इसलिए उसके प्रकोप के भय से वह अपने विशाल राज्य को लात मार कर अर्की में शिव सरण सिंह के पास आ गया। यहां से वह हरिद्वार चला गया। संभवतः अनिरुद्ध के साथ कांगड़ा से कुछ चित्रकार भी अर्की आए होंगे। उसने अनिरुद्ध चंद को दो पुत्रों मियां रणवीर वा मियां प्रमोद चंद को भी शरण दी थी। राणा शिव शरण सिंह एक धर्मपरायण व्यक्ति था। उसने कई मंदिर बनवाए और ब्राह्मणों को दान दिया। उसने एक ‘दीवानखाना’ भी बनाया। इसके बाद उसका पुत्र किशन सिंह गद्दी पर बैठा। जब कांगड़ा से मुगलों का प्रभुत्व समाप्त हो गया तो वहां का ऐतिहासिक प्रसिद्ध किला दोबारा संसार चंद के हाथ आ गया। संसार चंद अपने हाथ-पैर फैलाकर और अड़ोस-पड़ोस के अन्य राजाओं पर अपना प्रभुत्व जमाने लगा। वह उन्हें अपने राज भवन में आने तथा उसके सैनिक अभियानों में अपनी सेवाएं भेजने के लिए विवश करने लगा। वह पहाड़ी सम्राट बनने का स्वप्न देखने लगा। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने मैदानी भाग के उस क्षेत्र पर भी आक्रमण करके अपने अधिकार में करने का प्रयत्न किया, जिसे उसके पूर्वज महमूद गजनवी के आक्रमण के पश्चात खो बैठे थे, परंतु रणजीत सिंह ने उसकी एक न चलने दी और 1803 ई. व 1804 ई. में दोनों बार ही वापस धकेल दिया। उससे निराश होकर संसार चंद ने 1805 ई. में कहलूर (बिलासपुर) की ओर अपने शस्त्र मोड़े। उसने सतलुज के दाहिने किनारे के भाग पर अधिकार कर लिया। इस घटना से पहाड़ी राजाओं के मन में भी भय बढ़ गया। इसलिए कहलूर के राजा महान चंद ने राजा गुलेर, मंडी, सुकेत, कहलूर आदि के साथ मिलकर नेपाल के गोरखा सरदार अमर सिंह थापा को कांगड़ा पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया और सहायता देने का आश्वासन दिया। सन् 1805 ई. के अंत में अमर सिंह ने सतलुज पार करके कांगड़ा पर आक्रमण किया। चंबा की ओर से नथू वजीर सहायता लेकर आया। कांगड़ा की सेना ने वीरता से मुकाबला किया, परंतु वह बराबर युद्ध क्षेत्र में रहने के कारण थक चुकी थी, इसलिए वे गोरखा सेना को पीछे न मोड़ सकी और गोरखों ने कांगड़ा के किले को घेर लिया, जिसमें संसार चंद ने शरण ले रखी थी। यह घेरा चार वर्ष तक चलता रहा। अंत में संसार चंद ने अपने भाई फतेह चंद  को सन् 1809 ई. में महाराज रणजीत सिंह के पास सहायता के लिए भेजा। रणजीत सिंह ने सहायता देनी तो स्वीकार कर ली।                               

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