लकीरें खींचना

सदगुरु  जग्गी वासुदेव

ये देश बहुत जल्दबाजी में बनाया गया यानी हमने बस नक्शे पर लकीरें खींच दीं, अलग-अलग भौगोलिक विशेषताओं को ध्यान में रखे बिना। जब आप भौगोलिक विशेषताओं को ध्यान में रखे बिना लकीरें खींचते हैं, तो उनकी सुरक्षा करना मुश्किल होता है। मुझे लगता है कि सेनाओं के साथ यह अन्याय हुआ है। नौसेना को छोड़ कर जिसके पास एक स्पष्ट, कुदरती सरहद है, अभी आप इसी समस्या से जूझ रहे हैं। यह सही नहीं है सौ मील इस तरफ सौ मील उस तरफ  होने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। यह काम समझदारी से किया गया होता, तो आज हालात ऐसे न होते। सिर्फ  गांव ही नहीं, इन लकीरों ने घरों को भी बांट दिया। आप ऐसी बेतुकी लकीरें खींचते हैं और उम्मीद करते हैं कि उनकी सुरक्षा की जाए। सेनाओं से उम्मीद कि बेतुकी लकीरों की सुरक्षा करें। यह मैं पूरे सम्मान के साथ कह रहा हूं। आज मैं हॉल ऑफ  फेम देखने गया, मैंने पहले विश्व युद्ध से जुड़ी प्रदशर्नी भी देखी। यह दिल्ली में सेना ने लगाई थी और मैंने अपनी सेना के इतिहास के बारे में भी थोड़ा बहुत पढ़ा है। कृपया आप मेरी बात को सही अर्थ में समझें। लोगों को देश के लिए जीना चाहिए, देश के लिए मरना नहीं चाहिए बशर्ते गंभीर परिस्थिति न हो जिसे टाला न जा सके। पर जब आप एक अप्राकृतिक सीमा की सुरक्षा करते हैं, तो बहुत सारे लोग बिना वजह मारे जाते हैं। हम इसका गुणगान कर सकते हैं, ठीक है। जिन लोगों ने प्राण न्यौछावर कर दिए उनका सम्मान होना चाहिए, लेकिन फिर भी एक इनसान मर गया। हम इससे कितने भी अर्थ और भावनाएं जोड़ सकते हैं, लेकिन एक इनसान तो मर गया। यह अच्छी बात नहीं है। हमने बहुत बेतुकी लकीरें खींच दी हैं, जिनकी रखवाली करना मुश्किल है, क्योंकि कोई नहीं जानता कि आखिर वो लकीर है कहां। मुझे यकीन है, आप बॉर्डर पर रहते हैं फिर भी आपको नहीं पता कि असल में लकीर कहां है। शायद कुछ जगह आप कहेंगे कि यह नदी हमें बांटती है, ठीक है। यह आसान है पर खास तौर पर पश्चिमी बॉर्डर इस तरह खींचा गया है कि कोई नहीं जानता कि लकीर कहां है। हर समय सब उसे धकेलने में लगे रहते हैं। सत्तर साल के दौरान दोनों तरफ  से कितने लोग जान गंवा चुके हैं। सीमाओं को सही तरह से खींचने के लिए हम वक्त ले सकते थे।

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