विकास में नजरअंदाज प्रकृति

– कमलेश कुमार, फतेहपुर धमेटा

आधुनिकता की रफ्तार में देश पर्यावरण को जरिया बनाकर विकास की गाथाएं लिखने में मशगूल है। अपने स्वार्थ के चलते या फिर विकास के क्षेत्र में श्रेष्ठता हासिल करने के लिए हमने प्रकृति को नजरअंदाज कर दिया है। पर्यावरण को बचाने के लिए जो नीतियां बनी हैं, उनके सकारात्मक परिणाम पाने के लिए उनका उस शिद्दत से कार्यान्वयन नहीं किया जाता, जितना अपने स्वार्थ के चलते प्रकृति से लाभ प्राप्त करने के लिए किए जाने वाले अकार्यों में किया जाता है। पर्यावरण संरक्षण के सब प्रयास धराशायी होकर जमीन पर गिरते नजर आ रहे हैं। बिगड़ते वैश्विक पर्यावरण संतुलन को देखते हुए भी अगर हमने सुधार की ओर रुख नहीं मोड़ा, तो प्रकृति आपदाओं की जिस भयावह तस्वीर को हमारे सामने पेश कर रही है, भविष्य में इन्हें रोकना हमारे सामर्थ्य से बाहर हो जाएगा। 

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