विवेक चूड़ामणि

गतांक से आगे…

आचार्य के महाप्रस्थान या स्वधाम गमन के बारे में विद्वानों की अलग-अलग राय है। शृंगेरी पीठ से संबंधित ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि आचार्य शंकर ने बद्रीनारायण के दर्शनों के बाद दत्तात्रेय गुफा के दर्शन किए, फिर कैलाश में जाकर अपनी देह का त्याग किया। जबकि कामकोटि के ग्रंथों के अनुसार जीवन के अंतिम काल में आचार्य ने कांची में पहुंचकर पहले शिवकांची और विष्णुकांची की प्रतिष्ठा की फिर शिवकांची में भगवान सदाशिव का पूजन करते हुए उसी में लीन हो गए। एक अन्य मत के अनुसार आचार्य ने शृंगेरी में शारदा देवी के सामने अपनी देह का त्याग किया, जहां उन्हें समाधि दी गई। इसी तरह कुछ अन्य विद्वानों का कहना है कि आचार्य मालाबार प्रदेश के अंतर्गत त्रिचुर नगर में परशुराम मंदिर के भीतर देव शरीर में विलीन हो गए थे। कुछ अन्य विद्वानों की मान्यता है कि आचार्य ने कांची में मां कामाक्षी के समक्ष अपनी देह का त्याग किया, जहां मंदिर के द्वार के समीप ही उनके निर्जीव शरीर को समाधिस्थ कर दिया गया। कहीं यह प्रमाण मिलता है कि मुंबई के पास निर्मला नामक द्वीप में आचार्य ने अपने पार्थिव शरीर का परित्याग किया था। इसके अलावा कुछ मानते हैं कि परवर्ती शंकराचार्य से संबंधित तथ्यों का घालमेल आदिशंकर के जीवन के साथ हो जाने के कारण इस तरह की विविधता सामने आई है। लेकिन शरीर परित्याग के संदर्भ में विविध पक्षों का व्याख्यान होने पर भी आदि शंकराचार्य के जीवन की दिव्यता और अलौकिकता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इस बारे में सब एकमत हैं कि उन्होंने सनातन वैदिक की पुनर्स्थापना कर उपनिषदों के अद्वैत सिद्धांत को युक्ति और तर्क के आधार पर प्रस्तुत किया।  वेदांत शब्द के साथ सहज रूप से अद्वैत सिद्धांतों का जुड़ना आचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैत सिद्धांत की लोकप्रियता तथा सर्वस्वीकृति की ही पुष्टि करता है। वेदांत का तात्पर्य ही अद्वैत वेदांत से है। आचार्य शंकर ने ही ामद्भगवदगीता, ब्रह्मसूत्र, एकादशोपनिषद पर जहां भाष्य लिखे, वहीं मनोकामना पूर्ण करने वाले सुंदर स्त्रोतों की रचना भी की। इसी तरह सौंदर्यलहरी ग्रंथ में जहां उनकी ललित भाषा और आध्यात्मिक सौंदर्य की अभिव्यक्ति होती है, वहीं सिद्ध होता है कि वे तंत्र, मंत्र और यंत्र शास्त्र के गूढ़ रहस्यों के भी अद्भुत ज्ञाता थे। इसके अलावा चर्परपंजरिका में उन्होंने सरल सुगम भाषा शैली में वेदांत के सिद्धांत, प्रक्रिया स्वरूप और साधना को प्रस्तुत किया, उससे लगता है कि ज्ञान और भाव के समन्वय करने वाले अपने आपमें वे अनूठे महापुरुष थे। मणिरत्नमाला में प्रश्नोतर के रूप में  विवेचन किया है, उसका कोई सानी नहीं है। तत्त्व जिज्ञासुओं के लिए यह अत्यंत उपयोगी पुस्तिका है। इसी तरह छोटे-छोटे वेदांत स्तोत्रों में भी आचार्य ने साधकों के लिए अत्यंत उपयोगी सूत्र दिए हैं। आज के संदर्भ में, जब आंतरिक दूरियां बढ़ रही हैं, प्रत्येक स्वयं की श्रेष्ठता को सिद्ध करने के दुराग्रह से ग्रस्त है तथा बाहरी साधनों में सुख शांति की खोज में भागा-भागा फिर रहा है, आचार्य द्वारा सुरचित साहित्य मानवता को एक सुनिश्चित दिशा देने में सक्षम होगा, ऐसा भरतीय मनीषियों का विश्वास है।

नंदितानि दिंगतानि यस्यानंदांबुविंदुना पूर्णानंदं प्रभुं वंदे स्वयनंदैकस्वरूपिणम्र मंगलाचरण

मंगलाचरण की पंरपरा है शास्त्रों में । उद्देश्य है ग्रंथ रचना करते समय किसी प्रकार की विघ्न वाधा न आए। ईश्वर की कृपा मंगलकारिणी है। 

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