विष्णु पुराण

नास्तं गुणानां गच्छति तेनानन्तोऽयमव्ययः।।

यस्त नागधूहस्तैलेपितं हरिचन्दनम्।

मुहृः श्वासानिलाहास्तं याति दिक्षदिवासताम।।

यभाराथ्य पुराणर्षिगर्गो ज्योतिषितत्वयं।

ज्ञातवांसकलं चैव निमित्त पठित्रं फलम।।

तेनेय नागवर्येण शिरसा विधृता मही।

विभति मालां लोकानां सदेवासुरमानुषाम।।

जब मद से मत्त हुए भगवान शेष जम्हाई लेते हैं, तब समुद्र और वनों से युक्त यह संपूर्ण पृथ्वी डोल उठती है। गंधर्व, अप्सरा, सिद्ध, किन्नर, नाग, चारण आदि कोई भी इनके गुणों का अंत पाने में समर्थ नहीं  है। इसी से यह अविनाशी देव अनंत कहे जाते हैं। जिनकी देह पर नागों द्वारा लेपा गया चंदन श्वास लेने से छूट-छूटकर सब दिशाओं को सुगंधमय बनाता रहता है। पूर्वकाल में महर्षि गर्ग ने जिनकी आराधना करके ज्योतिमंडल ओर शुक्रनादि के नैमत्तिक फलों का तत्त्व ज्ञान प्राप्त किया था। उन्हीं नागवर शेष ने इस पृथ्वी को अपने शीश पर धारण कर रखा है। जो स्वयं भी देवता असुर मनुष्यादि के सहित संपूर्ण लोकमाला को धारण किए हुए हैं।

ततश्च नरकन विप्र भवोऽद्यः सलिलस्य च।

पापिनो येषु पात्यन्ते ताञ्छणुष्व महामुने।।

रोरवः सूकरो रोधस्तालो विशसनस्तथा।

महाज्वालस्तकुम्भो लवणोऽय विलोहितः।।

रुधिरांभो वैतरणिः कृमोशः कृमिभोजनः।

असिपत्रवनं कृष्णो लालाभक्षश्च दारुणः।।

तथा पूयवह पापो वहिलज्वलो ह्यधः शिराः।

संदर्शः कालसत्रश्च तमश्चायौयीचिरेव च।।

श्वभोजनोऽथाप्रतिष्यश्चाप्रतिश्च तथा परः।

इत्येवमादयश्चान्ये नरका भृशदारुणा।।

यमस्य विषये धोराः शस्त्राग्निभ्ययदायिनः।

पतंति येष पुरुषाः पापकर्मपतास्तु ये।।

कूटसाक्षो तथा सम्यक्क्षपातेन यो वदेत।

यशशान्यदसृतं वक्ति स नरो याति रौरवम।।

श्री पराशर जी ने कहा, हे विप्र! पृथ्वी और जल के नीचे नरक स्थित है, उनमें पापियों को गिराया जाता है, उनका वर्णन सुनो। रौरव, सूकर, रोध, ताल, विशसन, महाज्वाल तप्तकुंभ, लवण, विलोहित, रुधिरांभ, वैतरणी, कृमेश, कृमि भोजन, असि-पत्रवन, कृष्ण लालाभक्ष, दारुण, पूयवह, पाप वहिनज्वाल, अधशिरा, संदेश, कालसूत्र तमस, आवीचि, श्वभोजन, अतिष्ट और अप्रचि तथा इनके अतिरिक्त अन्य अनेक घोर नरक हैं, जिनका शासन यमराज करते हैं। यह नरक अत्यंत दारुण शस्त्र और अग्नि का भय देने वाले हैं। इनमें पापी पुरुष ही गिराए जाते हैं। कूट साक्षी अर्थात मिथ्या गवाही देने वाला या यथार्थ कहने वाला मनुष्य रौरव नरक को प्राप्त होता है।

भ्रूणहा पुरहंता च गौध्वश्व मुनिसत्तम।

यांति ते नरकं रोध यश्वौच्छासनिरोधकः।।

सूरापो ब्रह्महा हर्ता सुवर्णस्या च सूकरे।

प्रयांति नरुके यश्च तैः संसर्गमुपैति वै।।

राजन्यवैश्यहा ताले तथैव गुरुतल्पगः।

सप्तसुंये स्वसृगामो हंति राजभटश्चि यः।।

भ्रूण हत्यारे, ग्राम को नष्ट करने वाले और गौ-वधिक को रोध नामक नरक प्राप्त होता है। यह नरक श्वासोच्छवास को रोकता है। मद्यपंथी, ब्रह्मघाती, स्वर्ण, चोर अथवा इनकी संगति करने वाला पुरुष सूकर नरक गामी होता है। क्षत्रिय वैश्य का हत्यारा ताल नरक में जाता है, गुरुपत्नी भोगी भगिनी गामी और राजदूतों के हत्यारों को सप्तकुंड नरक मिलता है।

You might also like