विष्णु पुराण

एते चान्य च नरकाः शतशोऽथ सहस्रशः।

येष दुष्कृतकर्माणाः पच्यंते यातानागतः।

यथैव पापन्येतानि तथान्यानि सहस्रशः।

भुज्यंते तानि पुरुषैनैरकांतागोचरैः।

वर्णाश्रमविरुद्धं च कर्म कुर्वन्नि ये नराः।

कर्मणा मनसा वाचा निरुयषु पतंति ते।

अधाः शिरोभिर्द्दश्यप्ते नागकैदिवि देवताः।

देवाश्चाधोसुखान्सनिधः पश्यंति नारकान।

स्थावराः क्रिमयोऽब्जाश्च पक्षिण पशवौनराः।

धार्मिकास्त्रिदशास्तद्वन्मोक्षिश्च यथाक्रमम्।

सहस्रभागप्रथमा द्वितीयानुक्रामस्था।

सर्वे ह्येते महाभाग यावन्मुक्तिसमाश्रयाः।

यावंतो जंतधः स्वर्गेतावन्तो नरकोकसः।

पाकुयाति नरक प्रायश्चित्तपराङ मुखः।

इस प्रकार यह तथा अन्य सहस्रो ही नरक हैं, जिनमें पड़कर दुष्कर्म करने वाले प्राणी विभिन्न प्रकार की यंत्रणाए भोगते हैं। उपरोक्त पापों के समान अन्य अनेक हजारों पापकर्म हैं, उनके फल भिन्न में जाकर भोगने होते हैं। अपने- अपने वर्णाभ्रम धर्म के विरुद्ध जो मनुष्य मन, वाणी या कर्म से कोई कार्य करते हैं, उन्हें भी नरक की प्राप्ति होती है। अधोमुख नरक को प्राप्त हुए प्राणियों को स्वर्ग लोक में देवगण दिखाई देते हैं और वह देवगण भी नीचे के लोकों में पड़े उन नरकी प्राणियों को देखते रहते हैं। नरक की यंत्रणा भोगने के पश्चात पापोगत क्रमशः स्थावर, कृमि जलचर, पक्षी, पशु, मनुष्य, धार्मिक देवता और मुमुक्ष के रूप में उत्पन्न होते हैं। हे महाभाग! मुमुक्षु तक इन सब प्राणियो में दूसरे से पहले जन्म वाले प्राणियों की संख्या हजार गुना अधिक है। स्वर्ग में जितने प्राणी हैं, उन में भी जो व्यक्ति पापों प्रायश्चित नहीं करते, उन्हें नरक की ही प्राप्ति होती है।

पापाकामनुरूपाणि प्रायश्चित्तानि यद्यथः।

तथा तथैव संस्मृत्य प्राक्तासि परमर्षिभिः।

पापे गुरुणि स्वल्पपायल्पे च तद्विदः।

प्रायश्चित्तानि मैत्रेय जगुः स्वायम्भुवायदः।

प्रायश्चित्तान्यशेषणि तपः कर्मात्कानि वै।

यानि येषामशेषाणां कृष्णानुस्मरणस्परम्।

कृते पापेऽनुतापो वै यस्य पंसुः प्रजायते।

प्रायश्चितं तु तस्यैक हरिसंस्मरणं परम।

प्रातनिशि तथा मंध्याह्नादिषु सस्मरन्।

नारायणमवाप्नोति सद्यः पाक्षयान्नरः।

विष्णुसंस्मरणात्क्षीणमस्तक्लेशयञ्चयः।

मुक्ति प्रयाति स्वर्गाष्तिस्य विघ्नोऽनुमीयते।

बासुदेवे मनो यस्य जपहोमार्चनादिषु।

तस्यान्तराया मैत्रेय देवन्द्रत्वादिकं फलम्।

क्व नाकपृष्ठगमन पुररावृत्तिलक्षणम्।

क्व जपो वासदेवेति मुक्तिबीजमननुत्तमम्।

विभिन्न पापों के अनुरूप विभिन्न प्रायश्चित हैं, जिन्हें महर्षियों ने वेदार्थ के स्मरण पूर्वक कहा है। मैत्रेजी। स्वायभुव मनु आदि स्मृतिकारों ने पापों की अधिकता न्यूनता की दृष्टि या अल्प प्रायश्चित कल्पित किए हैं। परंतु तपात्मका और कर्मात्क प्रायश्चितों में भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करना सर्वश्रेष्ठ प्रायश्चित है। पाप करने के पश्चात जो पुरुष इसके लिए पश्चताप करता है, उसके लिए जो एकमात्र हरि स्मरण ही परम प्रायश्चित है। प्रातः रात्रि सायंकाल, मध्याह्नादि में भगवान श्रीहरि के स्मरण से पापों का श्रय हो जाता है।

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