वोट पाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर

साम-दाम-दंड-भेद की नीति पर सियासतदान, खूब चल रहा लूण लोटा

शिमला – वोट हासिल करने के लिए नेताओं की कोशिशें चरम पर हैं। चाहे जैसे भी हो वोट उन्हें ही मिले, इसके लिए साम-दाम-दंड-भेद की नीति पर नेता चलने लगे हैं। जहां पर जैसे ही वोट मिल जाएं, इसकी कवायद चल रही है। सालों पहले राजनीति सिद्धांतों पर आधारित थी, फिर वोट मिलें न मिलें, मगर सिद्धांत कायम रहते थे, परंतु धीरे-धीरे उस राजनीति का दौर खत्म हो गया और अब जैसे भी हो केवल वोट मिलना चाहिए, इस नीति पर सभी नेता चल रहे हैं। राजनीतिक दल सियासत के सिद्धांत भूल चुके हैं, लिहाजा हिमाचल में भी अब जैसे-जैसे चुनाव का दिन नजदीक आ रहा है, सभी तरह की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। नेताओं ने धार्मिक संस्थाओं के गेट लांघने शुरू कर दिए हैं, क्योंकि इनके अनुयायी बड़ी संख्या में हैं। इनके अनुयायियों की संख्या का आकलन कर नेता वहां पर वोट अपील को पहुंच रहे हैं और धार्मिक गुरुओं की शरण में आ गए हैं। कई प्रत्याशियों ने तो अपना प्रचार अभियान ही ऐसी धार्मिक संस्थाओं के यहां जाकर शुरू किया, जहां के अब लगातार चक्कर लगाए जा रहे हैं। इसी तरह से स्वयंसेवी संस्थाओं, कर्मचारियों की संस्थाओं व दूसरे संगठनों के पास पहुंचने का दौर शुरू हो गया है। शिमला में वकीलों के संगठन के पास पहले भाजपा आई और अब कांग्रेस ने भी बात की। हालांकि वकीलों के भी अलग-अलग विचारधारा के गुट बने हैं, लेकिन इनके जरिए सेंधमारी की कोशिशें हो रही हैं। इसी तरह से प्रदेश में कुछ स्थानों पर लूण लोटे की भी पुरानी परंपरा चलती रही है, जिसे भी इस चुनाव में अपनाया जा रहा है। लूण लोटा पुराने लोग किया करते थे, जिसका इस्तेमाल चुनाव में भी  किया जा रहा है। इसके जरिए प्रत्याशी अपने हक में पूरे गांव को कसम खिलाते हैं, ताकि उनको ही सभी लोग वोट दें। शिमला जिला के दूरवर्ती स्थानों और सिरमौर जिला में लूण लोटे की परंपरा आज भी कायम है। यहां चुनाव को नजदीक देख अब इस तरह की कोशिशें नेता करने लगे हैं।

देवता का आदेश सर्वोपरि

प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में ऐसा भी है, जहां पर रियासतों को खानदान की बात को माना जाता है। उस दृष्टि से भी नेता खुद को वोट लेने के लिए कोशिशें कर रहे हैं। ऐसे भी कई राजघराने हैं, जिनकी बात आज भी उस रियासत के लोग देवता के आदेश के रूप में मानते हैं।

You might also like