शाब्दिक अभद्रता

May 10th, 2019 12:05 am

जिस देश की महान सभ्यता और संस्कृति पर गर्व करते हम नहीं थकते, आज उसी का निकृष्ट, असंसदीय और अश्लील रूप सामने है। यह अभूतपूर्व व्यवहार नहीं है, लेकिन देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री ने पहली बार जनता के सामने अपने दर्द और जुल्मों की दास्तां पेश की है। उसमें पीडि़त होने का भाव भी निहित है और उसके जरिए सहानुभूति की सियासत भी खेली जा सकती है, लेकिन यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण और अस्वीकार्य है। हमारा मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी हों या 2019 में कोई और चुना जाए, अंततः वह देश का प्रधानमंत्री ही होता है। उसे नीच आदमी, मोस्ट स्टुपिड पीएम, निकम्मा, नशेड़ी, अनपढ़ और गंवार, चूहा, सांप, बिच्छू, रैबीज ग्रस्त बंदर, नकारा बेटा, नमकहराम आदि ‘विशेषणों’ से संबोधित नहीं किया जा सकता। उसके माता-पिता और दादा पर सवाल करना अनैतिक है। लोकतंत्र में चुना गया प्रधानमंत्री किसी भी स्तर पर तुगलक, औरंगजेब से भी क्रूर तानाशाह, नटवरलाल और दाऊद इब्राहिम नहीं हो सकता, क्योंकि उसके फैसलों और कारनामों पर भारत के संविधान और संसद की निगरानी मौजूद रहती है, लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मन करता है कि प्रधानमंत्री को तमाचा मारूं। बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने प्रधानमंत्री को न केवल ‘जल्लाद’ करार दिया, बल्कि भाजपा और जद-यू के नेताओं को ‘गंदी नाली का कीड़ा’ तक कहा है। ओफ्फ.. यह किस देश की चुनावी संस्कृति है? यह किस लोकतंत्र और गणतंत्र की भाषा है? इस भाषा में नफरत का भाव कूट-कूट कर भरा है। कोई संसदीय मर्यादा है अथवा नहीं? यह दलील भी स्वीकार्य नहीं है कि प्रधानमंत्री ने भी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं के लिए आपत्तिजनक शब्दों के इस्तेमाल किए हैं। संघ और भाजपा में शब्दों की मर्यादा निरंकुश रही है। बेशक दोनों पक्षों ने गाली-गलौज की संस्कृति अपनाई होगी, लेकिन अब मुद्दा देश के प्रधानमंत्री का है। पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने हरियाणा में ‘महाभारत’ की जमीं कुरुक्षेत्र में जनसभा को संबोधित करते हुए उन गालियों का ब्योरा दिया है, जो प्रधानमंत्री बनने से पहले और बनने के बाद लगातार उन्हें दी जाती रही हैं। प्रधानमंत्री बनने से पहले भी नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। प्रधानमंत्री के लिए हिटलर, मुसोलिनी और गद्दाफी सरीखे शब्दों का इस्तेमाल अपेक्षाकृत शालीन माना जा सकता है, क्योंकि उनमें व्यंग्य का भाव भी है, लेकिन मोदी को भस्मासुर, रावण, लहूपुरुष, गंदा आदमी, पागल कुत्ता, ठग, गंगू तेली, यमराज, कातिल आदि करार देना कौन-सी संस्कृति की भाषा है? क्या प्रधानमंत्री मोदी को गालियां देना कांग्रेस और विपक्षी दलों के संस्कार हैं? क्या ऐसी गालियां देकर इन दलों को भरपूर वोट हासिल होते हैं या जनाधार व्यापक होता है? हम 21वीं सदी की दुनिया में रहते हैं। करीब 65 फीसदी आबादी उन नौजवानों की है, जिनकी उम्र 35 साल से कम है। कमोबेश वे तो अनभिज्ञ होंगे कि एक पूरा पक्ष देश के प्रधानमंत्री को गालियां क्यों दे रहा है? चुनाव के दौरान राष्ट्रीय, सामाजिक, आर्थिक, सुरक्षा संबंधी मुद्दे कम हैं क्या, जो इन अपशब्दों पर चुनाव के धु्रवीकरण की कोशिश की जाती रही है? आखिर सभ्य समाज और लोकतंत्र में शब्दों और भाषा की मर्यादाएं लांघी क्यों जा रही हैं? सियासत इतनी बदजुबान क्यों हो गई है। विपक्ष को भी अपने लोकतंत्र और चुनाव प्रणाली पर पूरा भरोसा होना चाहिए कि सबसे ज्यादा जनादेश पाने वाला पक्ष ही प्रधानमंत्री चुनेगा और अंततः वह राष्ट्र का प्रधानमंत्री होगा। गालियां देने से व्यक्ति के रूप में प्रधानमंत्री का चेहरा ही मलिन नहीं होता, बल्कि देश की गरिमा और सम्मान पर भी कालिख पुतती है। उससे विपक्ष को हासिल क्या होगा? क्या गालियों से प्रभावित होकर देश की जनता विपक्ष के नाम जनादेश दे देगी? नफरत के साथ-साथ यह असहिष्णुता का भी मुद्दा है, जो सीधे हमारे संघीय ढांचे पर प्रहार कर रहा है। चुनाव और राजनीति का द्वंद्व आपसी विचारधारा के आधार पर होता रहा है, लेकिन अब यह निजता के अतिक्रमण में तबदील हो गया है। अब दो राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी आपस में जानी दुश्मन माने जाने लगे हैं। क्या उसी को ‘महान लोकतंत्र’ कहा जा सकता है? कमोबेश हम तो उस पक्ष में नहीं हैं।

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