श्री रघुनाथ मंदिर

राजा के वचन से आहत होकर दुर्गा दत्त ब्राह्मण ने अपने पूरे परिवार सहित एक घर में बंद होकर आत्मदाह कर लिया। ऐसी कथा आती है उसी समय से राजा रोगी हो गया। धीरे- धीरे राजा जगतसिंह कुष्ठ रोग से पीडि़त हो गए। इस बीमारी से मुक्ति तब जाकर मिली, जब अयोध्या से पयहारी बाबा के निर्देश पर त्रेता युगीन सीता और श्रीराम जी की मूर्ति यहां लाई गई…

हिमाचल प्रदेश देवभूमि है। हरियाली, स्वच्छ जलवायु, प्राकृतिक सौंदर्य तथा शांति का स्वर्ग है यह प्रदेश। यहां कदम-कदम पर बने छोटे-बड़े अनेक मंदिरों से आशीर्वाद प्राप्त होता है। ऐतिहासिक प्रसिद्ध प्राचीन श्री रघुनाथ मंदिर कुल्लू शहर के मध्य में मुख्य बस स्टैंड से लगभग 200 मीटर की दूरी पर स्थित है। यह मंदिर राजा जगत सिंह के शासनकाल में बना है। यह मंदिर ऊंची पहाड़ी पर शोभनीय है।

एक प्राचीन शैली की समस्त पहाड़ी निर्माण कला की इमारत है। छोटी गली से गुजर कर मंदिर का बाहरी प्राचीन शैली का दरवाजा आता है, उसके बाद भव्य मंदिर का आंगन आरंभ होता है। इस रघुनाथ मंदिर का आरंभ ही दुःख से होता है। इस मंदिर का निर्माण कुल्लू प्रदेश के दिवंगत राजा जगत सिंह ने करवाया था। कहते हैं राजा को कुष्ठ रोग हो गया था। वैद्यों ने ठीक होने की संभावना से साफ इंकार कर दिया। राजा जगत सिंह अपने दुख से व्याकुल हो रहे थे, उसी समय उनकी भेंट भुंतर क्षेत्र में रहने वाले पयहारी बाबा से हुई। पयहारी बाबा ने उन्हें कहा कि अयोध्या से श्री रघुनाथ जी और सीता माता की वो मूर्ति लेकर यहां आएं, जो अश्वमेध यज्ञ के समय में श्री राम जी ने स्वयं बनवाई थी। 

उसके बाद राजा जगत सिंह ने अपने अथक प्रयास से रत्न जडि़त सोने से बनी उस दिव्य मूर्ति को अयोध्या से मगवाया। यह घटना सन् 1672 ई की है रघुनाथ जी और सीता जी की मूर्ति यहां आते ही राजा का रोग चामत्कारिक रूप से ठीक होने लगा। कुछ ही महीनो में स्वस्थ होकर राजा ने यहां एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। उसी समय से यहां भगवान श्री रघुनाथ जी सीता जी सहित निवास कर रहे हैं।

कुल्लू को समर्पित दशहरा उत्सव उसी समय यानी सन् 1672 ई. से चला आ रहा है। इस चामत्कारिक कहानी से जुड़ी राजा जगत सिंह की वो कथा इससे भी अधिक दुःख और आश्चर्य जनक है। कहा जाता है कि एक बार राजा जगत सिंह के एक चाटुकार ने दुर्गा दत्त नामक एक गरीब ब्राह्मण की झूठी शिकायत राजा से कर दी कि इसके पास चार किलो मणि है। राजा ने बिना कोई जांच पड़ताल किए ही ब्राह्मण दुर्गा दत्त से जाकर कहा जब तक मैं मणिकर्ण से लौटकर आऊंगा, तब तक जहां भी मणि को छिपाकर रखा है, वहां से बाहर निकालकर रख देना और जब मैं यहां यात्रा से लौट कर आउं तब तुम्हें वह मणि मुझे देनी ही होगी।

कहते हैं राजा के वचन से आहत होकर दुर्गा दत्त ब्राह्मण ने अपने पूरे परिवार सहित एक घर में बंद होकर आत्मदाह कर लिया। ऐसी कथा आती है उसी समय से राजा रोगी हो गया। धीरे- धीरे राजा जगतसिंह कुष्ठ रोग से पीडि़त हो गए। इस बीमारी से मुक्ति तब जाकर मिली जब अयोध्या से पयहारी बाबा के निर्देश पर त्रेता युगीन सीता और श्रीराम जी की मूर्ति यहां लाई गई।

 

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