संगीत सीखा नहीं, पर रूह में है शामिल

ठियोग में जन्मे नाटी किंग कुलदीप शर्मा का कहना है कि संगीत उन्होंने सीखा नहीं, लेकिन उनकी रूह में यह शामिल है। कुलदीप शर्मा का कहना है कि उनके ऊपर उनके माता-पिता का साया नहीं है, लेकिन उनके अभिभावकों का भी यह सपना था कि वह हिमाचल को संगीत के क्षेत्र में नया आयाम दें। ‘दिव्य हिमाचल’ से बातचीत करते हुए कुलदीप शर्मा ने कहा कि उनके संघर्ष के समय में संगीत में आगे बढ़ना काफी मुश्किलों भरा सफर रहता था। पहले लाइव काम होता था अब तकनीकी काम से संगीत को जनता तक पहुंचाया जाता है, जिससे संगीत की भावना कुछ बदली भी दिखती है। अब रिकॉर्डिंग काम है, जिसके कारण भले ही परेशानी कम होती हो, लेकिन संगीत क्षेत्र में साज बजाने वाले अहम कलाकारों से मन का संपर्क कम रहता है। उन्होंने कहा कि लोगों का प्यार है कि उनके गीतों को खूब सराहा जा रहा है। डेढ़ सौ से अधिक हिट लोकगीतों और इतनी ही एलबम निकालने वाले कुलदीप ने कहा कि उन्होंने वर्ष 2002 से अपने करियर की शुरुआत की है। कुलदीप शर्मा ने कहा कि उनका ‘बांठण चली जातरे-जातरे’ गीत को बालीवुड फिल्म कुरूक्षेत्र में भी इस्तेमाल हुआ है जिसे गायक सुखविंद्र ने अपनी आवाज दी है। हिमाचल के लोगों ने ही नहीं बल्कि कई प्रदेशों के लोगों ने उन्हें प्यार दिया है। कुलदीप का कहना है कि वह देश के कोने-कोने में स्टेज शो कर चुके हैं। दर्शकों की मांग पर जल्द वे अपने नए गीतों को लेकर आएंगे। वहीं उनकी आने वाली फिल्म ‘यारियां’ भी जल्द आ रही है। इस हिमाचली फिल्म में उन्होंने अभिनेता की भी भूमिका निभाई है और गानों को आवाज भी दी है। उन्हें उम्मीद है कि दर्शक उन्हें पहले की तरह ही खूब प्यार देंगे। उन्होंने कहा कि एक वह दौर था जब गीतों की कैसेट व एलबम बाजार में आती थी। इनके एवज में कलाकारों को रॉयल्टी मिलती थी, लेकिन आज का भी यह दौर है कि जब कलाकार अपने गीत तो गाते हैं, लेकिन उन्हें यू-ट्यूब पर अपलोड करके लाइक के माध्यम से काम चला रहे हैं।

— दीपिका शर्मा, शिमला

हिमाचल का अपना हो हिलीवुड

कुलदीप शर्मा का कहना है कि हिमाचल में भी फिल्म सिटी का निर्माण होना चाहिए। कुलदीप शर्मा ने कहा कि हिमाचल की हसीन वादियों का बॉलीवुड हमेशा ही कायल रहा है। यहां कई जगह फिल्मों की शूटिंग होती है। बॉलीवुड, टॉलीवुड, पॉलीवुड के बाद हिमाचल के नाम से भी अपना हिलीवुड होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार हिमाचली संस्कृति को प्रमोट करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है लेकिन यहां फिल्म सिटी के निर्माण से हिमाचली संस्कृति को अधिक प्रचार में मदद मिलेगी।

कई मंचों पर हुए हैं सम्मानित

कुलदीप शर्मा को हिमाचल के अलावा उत्तराखंड, चंडीगढ़ में भी कई बार विभिन्न मंच पर सम्मानित किया जा चुका है। नाटी किंग कुलदीप शर्मा को वर्ष 2011 में उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा हिमश्री अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा पंजाब व चंडीगढ़ में भी कुलदीप शर्मा अपनी आवाज के बलबूते कई पुरस्कार ले चुके हैं। हिमाचल के सभी अंतरराष्ट्रीय व राज्य स्तरीय मेलों जिनमें अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा, मंडी की शिवरात्रि, रामपुर का लवी मेला, श्रीरेणुकाजी अंतरराष्ट्रीय विंटर कार्निवाल मनाली जैसे प्रदेश के लगभग हर जिला में कुलदीप शर्मा हजारों कार्यक्रम दे चुके हैं।

मुलाकात ः कोशिश करें, तो एक हिमाचली भाषा संभव…

पहली बार संगीत से कैसे रू-ब-रू हुए या यह लगा कि यही आपके भीतर बह रहा है?

संगीत तो रूह में है। जब से होश संभाला है तो लगा कि इसके बगैर मेरा जीना संभव हो ही नहीं सकता। संगीत के बगैर खुशी भी नहीं है और दुख को भी मैं संगीत के बिना महसूस नहीं कर सकता हूं।

किस सुर और किसकी लय ने आपको खींचा और प्रेरित हो गए?

मेरी मां मेरी प्रेरणा है। उन्हीं से संगीत को महसूस करने की शक्ति मिली है। अपनी मां से ही मैंने प्रेरणा लेकर आगे बढ़ने की सोची है, जिसमें अब लय को जानने का प्रयास कर रहा हूं।

नाटी को आप गीत-संगीत व नृत्य के अलावा क्या मानते हैं?

नाटी हिमाचली संगीत की एक ऐसी आत्मा है, जो एक गीत-संगीत और नृत्य ही नहीं बल्कि हिमाचल की एक ऐसी पहचान है जो अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचानी जा सकती है। बालीवुड में भी हिमाचल की स्वरलहरियों को गाया गया , जिससे पहाड़ी बोली के शब्दों को बड़े स्तर पर एक पहचान मिलने का रास्ता बनता देखा गया है।

अति भावुक क्षण जो संगीत की राह से मिले या अपनी भावुकता को किस तरह गीत-संगीत में छिपाना चाहते हैं?

जब मेरी माता की मृत्यु की खबर मुझ तक पहुंची थी तो मेरा कार्यक्रम माहूंनाग में था, लेकिन इस बात को मैंने उस समय किसी के सामने जाहिर नहीं होने दिया। शाम आठ बजे कार्यक्रम था। उसके बाद रात दस बजे मेरी आंखों से भी आंसू फूटे और दिल बहुत गमगीन हो गया। इस दर्द को मैंने संगीत में छिपा लिया था। उस संगीत में मेरा मन उदास था।

किसी गायक की पहचान के लिए कौन सी शर्तें हैं?

किसी गायक की पहचान के लिए उसकी मिट्टी के लिए ईमानदारी जरूरी है, जिसमें वह अपनी कला में निःसदेंह माहिर होना चाहिए। वहीं, ऐसे शब्दों का चयन करने से भी उसे बचना चाहिए जो समाज के लिए एक घातक सिद्ध हो सके। गायक को अपने सरगम का भी पक्का होना जरूरी है।

खुद को किसकी प्रतिस्पर्धा में देखते हैं या किन हिमाचली गायकों के मुरीद हैं?

खुद की प्रतिस्पर्धा में, मैं अपने आप को ही देखता हूं और अपने आप से ही बेहतर करने की कोशिश में लगा रहता हूं। मुझे केवल सहगल की गायकी खूब प्रभावित करती है।

कोई तीन सुझाव, जिनसे हिमाचल की गायकी के आयाम बदल सकते हैं?

हिमाचली गायकी के आयम बदल सकते हैं जिसके लिए कुछ सुझाव हैं, इसमें पहला तो यह है कि गायक को अपने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। वह ऐसे गाने न गाए, जिससे समाज पर कोई दुष्प्रभाव पड़ता हो। दूसरा कलाकार को एक बेहतर मंच की हमेशा जरूरत रहती है, जिसके लिए सरकार को भी एक बेहतर रास्ता देना चाहिए। तीसरा सुझाव यह है कि गायक को एक बेहतर लेखक के गानों को गाना चाहिए। गाने में मिट्टी की खुशबू और संस्कृति की झलक भी चाहिए।

हिमाचल के सांस्कृतिक समारोहों में हिमाचली गायक को कितना सम्मान मिल रहा है, क्या होना चाहिए?

प्रदेश के सांस्कृतिक समारोह में हिमाचली गायक को सम्मान मिल रहा है, लेकिन ग्राफ  इतना ज्यादा नहीं है, जितना उसे मिल सकता है। कार्यक्रमों में हिमाचली कलाकरों को साठ फीसदी और बाहरी कलाकारों को 40 फीसदी कार्यक्रमों की संख्या मिलनी चाहिए।

अपने स्टाइल को कैसे परवान चढ़ाते हैं। किसी पंजाबी या अन्य राज्य के गायक से जो सीखते हैं?

मैं पंजाबी गायक गुरदास मान की गायकी का खूब कायल हूं। उनमें अपनी कला का प्रदर्शन करने का एक ऐसा तरीका है जो अपने संगीत के प्रति एक ईमानदारी झलकाता दिखता है।

क्या आपको लगता है कि हिमाचली लेखक प्रदेश की लोक गायकी पर कम लिख रहे हैं। आप किस लेखक के लिखे गीतों को गाना चाहेंगे?

हिमाचली लेखक  प्रदेश की लोक गायकी पर ज्यादा नहीं लिख रहे हैं। अभी लायक राम रसीक, सुरेंद्र गांगी और हरि कृष्ण वर्मा की लेखनी बहुत पसंद है। इनके लिखे मैंने बहुत गाने गाए हैं।

अचानक इन्हां बडि़यां जो तुड़का लायां ओ ठेकेदारणिएय’ तक जा पहुंचे या अब कांगड़ा-चंबा के गीतों पर कुलदीप शर्मा की और भी महफिल सजेगी?

जल्द ही, जब कोई भी कहे कहीं पर भी यह महफिल सजेगी। हिमाचल की जनता के लिए मेरी सरगम हमेशा तैयार है।

क्या यह संभव है कि प्रदेश की सभी बोलियों पर आधारित एक ‘हिमाचली भाषा’ बन सकती है?

जरूर बननी चाहिए। इससे हिमाचली संगीत को एक बड़ा आयाम मिल सकता है, अगर विशेषज्ञ यदि एक कोशिश करें तो यह जरूर संभव है, जिससे हिमाचली भाषा बन कर इसे एक बड़ा मंच मिल सकता है।

बाहरी प्रदेशों में आपको किस प्रकार प्रतिक्रिया सुनने को मिलती है?

बाहरी राज्यों को पहाड़ी बोली के शब्द का अर्थ समझ न आए, लेकिन प्रदेश का मीठा संगीत सुकून देता है, जो निःसदेंह बाहरी राज्यों में खूब पसंद किया जा रहा है।

संगीत की दुनिया में आपका सपना और ड्रीम प्रोजेक्ट?

मेरी अभी ‘यारियां’ फिल्म आ रही है। जो कांगड़ी बोली में है इस फिल्म की सफलता ही मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट है।

कुलदीप शर्मा की रूह तक जो संगीत पहुंचता है, उससे निकली दो पंक्तियां या आपकी पसंदीदा नाटी?

रोहड़ू जाना मेरी आमिए, शिल्पा शिमले वालिए ऐ, मैंरी प्रीति जिंटा कै ई, के चली तो मेरे दिल के  नजदीक हैं। वैसे मैं कोशिश करता हूं कि सभी नाटियां जनता के दिलों तक पहुंचे ।

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