संतन को कहां सीकरी सो काम

नवेंदु उन्मेष

वरिष्ठ पत्रकार

संत कुंभनदास ने लिखा है – ‘संतन को कहां सीकरी सो काम, आवत जात पनहिया टूटी, बिसरिय गयो हरि नाम’। इससे जाहिर होता है कि संत कुंभनदास के जमाने में संतों को सीकरी के राजा से मिलने की जरूरत नहीं पड़ती थी। उस जमाने के साधु-संतों का मानना था कि सीकरी के राजा से मिलने के लिए आते-जाते जूते टूट जाते हैं और भगवान का नाम लेना भी भूल जाना पड़ता है, लेकिन आज के साधु-संत सीकरी से मिलना चाहते हैं और सीकरी खुद बनना भी चाहते हैं। योगी आदित्यनाथ खुद यूपी के सीकरी बन बैठे हैं। साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, दिग्गी राजा दिग्विजय सिंह को भोपाल के चुनाव मैदान में चुनौती दे रही हैं। यहां तक कि उन्होंने खुद को महिषासुरमर्दिनी घोषित कर दिया और कहा कि वह राक्षसों का विनाश कर देंगी। मुझे लगता है भोपाल के देवता लोग राक्षसों से तंग रहे होंगे और शक्ति पूजा की होगी, तो उन्हें महिषासुरमर्दिनी मिल गई है। वैसे मैं बता दूं कि मेरे शहर में राक्षसों का तांडव नहीं है। इसलिए मेरे शहर के लोगों को किसी महिषासुरमर्दिनी की जरूरत भी नहीं पड़ी। हां कुछ समय तक मेरे राज्य झारखंड में नक्सलियों का तांडव जरूर रहा, लेकिन राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने खुद अपनी शक्ति से उनका मर्दन जरूर कर दिया। हालांकि आज के संतों की हालत यह है कि वे सीकरी से मिलकर अपना काम निकालना भी जानते हैं। जब शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने कई संतों को मंत्री का दर्जा दे दिया था। ऐसे संतों के आगे-पीछे गाडि़यां दौड़ती थीं और भक्तों को उनका दर्शन दुर्लभ हो गया था। उनका हरि नाम कहां गया, यह तो वे खुद जानें। जाहिर है आज के जमाने में हरि नाम में इतनी ताकत तो जरूर है कि साधु-संतों को भी चुनाव का टिकट मिल जाता है। कहीं-कहीं तो वे चुनाव जीत भी जाते हैं और संसद व विधानसभाओं में पहुंच जाते हैं। जो नहीं पहुंच पाते हैं, उन्हें राज्य मंत्री का दर्जा हासिल हो जाता है। आज के जमाने में वैसे संत कहां, जो कहें कि ‘मांगी-मांगी भोजन करहीं और द्वारे-द्वारे जाहीं’। आज के संतों को सीधे सत्ता का गलियारा नजर आता है। कई संतों की बोली से ऐसी आग की गोली निकलती है कि किसी को लग जाए, तो वह वहीं घायल हो जाएगा। पहले संत श्राप देते थे। अब जो राजनीतिक संत हैं, वे गालियां देने से नहीं चूकते।

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